हकीकत छिपाकर खुश करने की बाजीगरी-एक्सपर्ट की राय-बजट 2008-बिज़नस-Navbharat Times
 
हकीकत छिपाकर खुश करने की बाजीगरी
29 Feb 2008, 2323 hrs IST,नवभारत टाइम्स  
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प्रो. बी.बी. भट्टाचार्य

यह पब्लिक को ज्यादा से ज्यादा खुश करने वाला इलेक्शन बजट है, पर इसकी राह में कई शंकाएं हैं, जैसे कुछ अरसे से इकनॉमिक स्लोडाउन की चर्चाएं हैं, लेकिन हमारे वित्त मंत्री इस बारे में तकरीबन खामोश ही रहे। शायद उन्हें लगा हो कि मंदी एक अस्थायी स्थिति है। वे अमेरिकी डॉलर कमजोर पड़ने से निर्यात सेक्टर पर पड़ने वाले असर से अनजान तो नहीं होंगे। उन्हें शायद यह भरोसा है कि देश की ग्रोथ रेट कम नहीं होने वाली, कॉरपोरेट सेक्टर से वे काफी सहयोग की उम्मीद कर रहे हैं।

वित्तमंत्री ने महंगाई रोकने के साथ-साथ डिवेलपमेंट की दर बनाए रखने के लिए भी कुछ विशेष प्रबंध नहीं किया है। एक्साइज दरों में कटौती की गई है। इंडस्ट्रियल गुड्स सस्ते होंगे, पर बात तो तब है, जब कंपनियों का उत्पादन बढ़े और उसका लाभ कंस्यूमर को हो। सरकार का कहना है कि सर्विस सेक्टर से ज्यादा वसूल कर वह मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से बोझ को कम करना चाहती है। लेकिन आज जनता का ज्यादा वास्ता सर्विस सेक्टर से ही पड़ता है। आप टेलिफोन एक बार खरीदते हैं, लेकिन उसके जरिए ली जाने वाली सेवा पर शुल्क हर महीने देते हैं। इससे तो जनता पर ज्यादा भार पड़ेगा, जो एक खराब संकेत है।

दूसरी बात, यह चुनावी बजट है, बड़ी लुभावनी बातें इसमें की गई हैं। पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की बढ़ती कीमतों पर भी नजर डालिए। पेट्रोल की कीमतों में दिनों-दिन इजाफा हो रहा है। यही नहीं, लगभग पूरी दुनिया में कमॉडिटी (जिन्स) प्राइस में बढ़ोतरी हो रही है। इनके असर से बचाने की कोई कोशिश बजट में नजर नहीं आती। मान लीजिए, ऐन चुनावों के वक्त यह असर भारत पर दिखने लगा, तो उस वक्त जनता को इससे कैसे बचाएंगे। इसी तरह पे कमिशन के बारे में वित्त मंत्री खामोश रहे हैं। रोजगार गारंटी योजना को पूरे देश में लागू करना स्वागत योग्य है।

सोशल सेक्टर के लिए किए गए बजटीय उपायों को देखकर लगता है कि वित्त मंत्री ने कमाल कर दिया, पर ऐसा कतई नहीं है। अल्पसंख्यकों के बारे में सच्चर कमिटी की रिपोर्ट लागू करने और मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए सौ करोड़ रुपये रखने के सिवा उन्होंने नया क्या किया है? जिन-जिन योजनाओं का जिक्र उन्होंने बजट भाषण में किया, वे पहले से लागू हैं। मैं इसे निराश करने वाला बजट तो नहीं कहूंगा, पर इतना जरूर है कि वास्तविकताओं का खयाल रखते हुए कुछ ठोस उपाय किए जाते, तो अच्छा रहता।
( लेखक जेएनयू के वाइस चांसलर हैं)





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