कौंतेय
सिन्हा
नई
दिल्लीः
गोवा में दस
दिनों के अंदर
प्लाज्मोडियम
वाइवैक्स
पैरासाइट से
पैदा होने
वाले मलेरिया
से दो मरीजों
की मौत ने इस
डर को बढ़ा
दिया है कि
मलेरिया का
अपेक्षाकृत
कम घातक माना
जाने वाला रूप
भी जानलेवा हो
सकता है। अब तक
मलेरिया से
होने वाली
मौतों के लिए
फैल्सिपेरम
प्रकार के
प्लाज्मोडियम
को ही प्रमुख
रूप से
जिम्मेदार
माना जाता रहा
है।
सबसे
ताजा शिकार
हुए हैं, बिहार
के मूल निवासी
18 साल के सुनील
कुमार।
उन्हें गोवा
के गवर्नमेंट
कॉटेज
हॉस्पिटल,
वास्को में
प्लाज्मोडियम
वाइवैक्स
मलेरिया से
पीड़ित पाया
गया। कुमार की
मौत एक्यूट
रेस्पिरेटरी
डिस्ट्रेस
सिंड्रोम की
वजह से हुई।
केंद्रीय
स्वास्थ्य
मंत्रालय ने
आईसीएमआर के
मलेरिया
रिसर्च सेंटर
के डायरेक्टर
डॉक्टर ए. पी.
दास की अगुवाई
में संक्रामक
बीमारियों के
एक्सर्पट्स
की एक टीम को
इन मौतों की
जांच के लिए
गोवा रवाना
किया है।
इस
टीम में नैशनल
इंस्टिट्यूट
ऑफ मलेरिया
रिसर्च की
डॉक्टर नीना
वलेचा भी
शामिल हैं।
टीम द्वारा एक
हफ्ते के अंदर
नैशनल वेक्टर
बोर्न डिजीज़
कंट्रोल
प्रोग्राम को
अपनी रिपोर्ट
पेश किए जाने
की संभावना
है। डॉ. दास ने
टाइम्स ऑफ
इंडिया को
गोवा से बताया
कि हम यह जानना
चाहते हैं कि
क्या
प्लाज्मोडियम-वाइवैक्स
वास्तव में
लोगों की मौत
की वजह बन रहा
है। हम इसके
बदलते
क्लिनिकल
प्रोफाइल से
निबटने के लिए
तैयार रहना
चाहते
हैं।
उन्होंने
यह भी बताया कि
पी-वाइवैक्स
से होने वाली
मौतें बेहद
नगण्य हैं।
इसलिए हमारी
रिसर्च इस बात
पर ध्यान
केंद्रित
करेगी कि गोवा
में होने वाली
ये मौतें केवल
पी-वाइवैक्स
इन्फेक्शन के
कारण हुई हैं
या इन मामलों
में
पी-फैल्सिपेरम
इन्फेक्शन भी
कसूरवार था।
मेडिकल साइंस
में
पी-फैल्सिपेरम
इन्फेक्शन से
निबटने के लिए
कारगर दवाएं
मौजूद हैं
इसलिए इनके
मामलों की
संख्या घटी
है।
दुनिया
भर में अब तक
मलेरिया के
पी-फैल्सिपेरम
रूप पर ही
वैज्ञानिकों
और डॉक्टरों
का फोकस था
क्योंकि इस
रूप को ज्यादा
घातक और
जानलेवा माना
जाता था।
लेकिन अब भारत
और
इंडोनेशिया
से रिपोटेर्ं
मिली हैं कि
पी-वाइवैक्स
ने भी
सेरेब्रल
मलेरिया
फैलाना शुरू
कर दिया है।
इसलिए इन
मौतों की जांच
ज्यादा अहम हो
गई है।