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कैसे-कैसे होते हैं बादल भी
23 Jul 2008, 0032 hrs IST,नवभारत टाइम्स  
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यज्ञ शर्मा

इस बरसात में आप सिर उठाइए और आसमान की ओर देखिए। आपको बादल दिखाई देंगे। आप मन ही मन हंस रहे होंगे। बरसात में बादल नहीं तो और क्या दिखाई देगा? सही है। लेकिन आप जरा गौर से देखिए। आपको बादलों के अलग-अलग रूप दिखाई देंगे। उतने रूप, जितने इन्सान के होते हैं।

कुछ बादल भले मानुस होते हैं। नन्ही-नन्ही बूंदों में बरसते हैं। गर्मी मिटाते हैं, प्यास बुझाते हैं। ऐसी ठंडक पहुंचाते हैं कि आत्मा तक तृप्त हो जाती है। ज्यादातर बादल ऐसे होते हैं। ज्यादातर आदमी ऐसे ही होते हैं क्या?

कुछ बादल नेता टाइप होते हैं। काफिले में आते हैं। माहौल पर छा जाते हैं। गरज-गरज कर घोषणा करते हैं। बारिश की आशा जगाते हैं और फिर बिना बरसे गुजर जाते हैं।

कुछ बादल तो जैसे अमेरिका के प्रेजिडेंट होते हैं। दुनिया को इराक समझते हैं। बम की तरह गरजते हैं। गोलियों की तरह बरसते हैं। लाचार इंसानों के घरबार मिट्टी में मिला देते हैं।

कुछ बादल मंत्री जैसे होते हैं, नालायक और भ्रष्ट। जनता का खेत सूखा छोड़ देते हैं, रिश्तेदारी का रेगिस्तान सींचते हैं। रेत पानी सोख लेती है। उपजाऊ जमीन बंजर रह जाती है।

कुछ बादल विश्वास मत पर होने वाली बहस की तरह होते हैं, वे बरसते कम हैं, पर कीचड़ ज्यादा पैदा करते हैं। ऐसा घटाटोप अंधेरा पैदा करते हैं कि आम जनता को पता नहीं चलता कि देश किधर जा रहा है -जिधर जाए उधर ही रसातल नजर आता है। ऐसी बिजलियाँ कड़काते हैं कि लगता है सरकार यदि बच गई/ या गिर गई तो आसमान फट पड़ेगा। लेकिन कुछ भी नहीं होता या कुछ हो भी जाता है तब भी आसमान और वोटर- दोनों यथावत बने रहते हैं।

कुछ बादल राहत सामग्री बांटने वाले अफसर जैसे होते हैं, नब्बे फीसदी 420। गगरी भरी तो होती है, पर उडे़लते नहीं। बस दो-चार बूंद टपका देते हैं। जल की झलक मृगजल की तरह दिखाते हैं।

कुछ बादल खास मुंबई के लिए बनते हैं। नहीं बरसें तो मुसीबत, बरसें तो और ज्यादा मुसीबत। कुछ बादल महिला होते हैं। सिसकियों में गरजते हैं, आंसुओं में बरसते हैं। कुछ बादल बालक होते हैं। कपास जैसे नर्म, मखमल जैसे गुदगुदे। चुलबुले, शरारती। गहक कर पहाड़ पर चढ़ जाते हैं। बांहें फैला कर चट्टानों से लिपट जाते हैं। घाटियों में छिप जाते हैं। अचानक निकल कर बरस जाते हैं।

जब बारिश का मौसम आता है, बदलियां लाइन लगा कर, एक-दूसरे के पीछे स्कूल की बच्चियों जैसी उछलती-कूदती आती हैं। मौसम के जाते-जाते बच्चियां जवान हो जाती हैं। रूप निखर आता है। बदली विश्वसुंदरी बन जाती है। कैसे-कैसे रमणीय रूप दिखाती है। सूरज की किरणों से रंग चुरा कर मनमोहक मेक-अप करती है। आसमान में जैसे सौंदर्य प्रतियोगिता चलती है। हसीन बदलियां कैट वॉक करती हैं। बदलियों के इस रूप पर पूरी दुनिया फिदा होती है।

तो, बादलों के इंसानों जैसे अनेक रूप हैं। पर इतनी गनीमत है कि बादलों ने अब तक इंसान का एक रूप नहीं अपनाया है- बाजारू! वरना आसमान में टोंटी लग गई होती। फिर पहले मीटर लगाया जाता, तब पानी आता। पनघट के घट नहीं तो, मिनरल वॉटर की बोतलें पैक हो जातीं।

बारिश के मौसम में कालिदास ने मेघदूत लिखा था। यानी, एक समय ऐसा था जब आदमी और बादल आपस में बातें किया करते थे। अब कोई बात नहीं होती। क्योंकि, अब ऐसे आदमी नहीं होते जो बादलों की तरह पवन बन कर हवा में उठें, धुंध बन कर घाटी में उतरें, पहाड़ पर चढ़ें, चोटी पर बरसें, ठंडी बर्फ बन कर जमें। फिर इंसानियत की गरमी से धीरे-धीरे पिघलें, झरना बन कर फूटें, नदी बन कर बहें। आदमी का नदी बनना बड़ा जरूरी है। क्योंकि, सभ्यता का विकास नदी के किनारे ही होता है। आज आधुनिकता का विकास तो हो रहा है, सभ्यता का विकास कहीं दिखाई नहीं देता। कारण सब जानते हैं। इंसान ने कुदरत से बात करना जो बंद कर दिया है। इंसान जैसे बादल तो अब होते हैं, बादल जैसे इंसान अब नहीं होते।
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