नीतू
सिंह
नई
दिल्लीः
एचआईवी
पॉज़िटिव
महिलाओं और
उनके गर्भस्थ
शिशु को
स्वस्थ जीवन
देने के लिए
दिल्ली एड्ज़
कंट्रोल
सोसायटी ने
आउट रीच वर्कर
योजना बनाई
है। इसके तहत
प्रेग्नंट
महिला में
बीमारी का पता
लगने से बच्चे
के जन्म के 18
महीने बाद तक
उनकी
रेग्युलर
काउंसलिंग और
देखभाल की
जाएगी, ताकि
शिशु को
बीमारी का
खतरा न रहे।
यह योजना
सबसे पहले
ईस्ट,
नॉर्थ-ईस्ट,
सेंट्रल और नई
दिल्ली जिलों
में शुरू की
जाएगी। इसके
तहत 24 हेल्थ
वर्कर काम
करेंगे। वे
महिलाओं की
काउंसलिंग से
लेकर समय-समय
पर उन्हें
अस्पताल ले
जाने, उनके
पोषण व दवाओं
आदि का ख्याल
रखने, उसी
अस्पताल में
डिलिवरी
कराने और
बच्चे के जन्म
के बाद 18 महीने
तक टीका व
दवाएं आदि
मुहैया कराने
का काम
करेंगे।
दिल्ली एड्ज़
कंट्रोल
सोसायटी के
अधिकारियों
का कहना है कि
दिल्ली में 16
प्रिवेंशन ऑफ
पेशेंट टु
चाइल्ड
ट्रांसमिशन
सेंटर हैं।
यहां आनेवाली
प्रेग्नंट
महिलाओं की
काउंसलिंग की
जाती है और
उन्हें
एचआईवी टेस्ट
के लिए तैयार
किया जाता है।
अगर कोई
महिला
पॉज़िटिव पाई
जाती है तो
उसकी पोस्ट
काउंसलिंग की
जाती है। साथ
ही, उसे तैयार
किया जाता है
कि वह हर महीने
अस्पताल आकर
टेस्ट आदि
कराए और उसी
हॉस्पिटल में
डिलिवरी कराए
ताकि जन्म के
समय बच्चे को
एंटी
रिट्रोवायरल
ड्रग दी जा
सके।
डिलिवरी
के चार घंटे
पहले दी जाने
वाली इस दवा को
देने के 18
महीने बाद तक
बच्चे में
एचआईवी के
एंटी बॉडीज़
डिवेलप हो
पाते हैं। उस
दौरान उसे
नियमित
देखभाल की
जरूरत पड़ती
है, मगर
ज्यादातर
पेग्नंट
महिलाएं एक-दो
बार के बाद
सेंटर आना बंद
कर देती हैं।
यही वजह है कि
आज भी सिर्फ 49
फीसदी एचआईवी
पॉज़िटिव
प्रेग्नंट
महिलाओं को ही
यह दवा मिल
पाती है। ऐसे
में एचआईवी
पॉज़िटिव 30
फीसदी
महिलाओं के
बच्चों में
एड्स का खतरा
रहता है। इस
समस्या से
निबटने के लिए
आउट रीच वर्कर
योजना बनाई गई
है। इसके तहत
काम करने वाले
हेल्थ वर्कर
डिस्ट्रिक्ट
हॉस्पिटल के
साथ मिलकर काम
करेंगे।
उल्लेखनीय है
कि फिलहाल
दिल्ली में 30
हजार एचआईवी
पॉज़िटिव लोग
हैं।