हम पहले की ही तरह रह गए... -हंस ले इंडिया-पाठक पन्ना-Navbharat Times
 
हम पहले की ही तरह रह गए...
29 Sep 2008, 1152 hrs IST,नवभारतटाइम्स.कॉम  
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रमेश कुमार निर्मेष

अंजाम अपने इश्क का
मैं सोचता, यूं हीं बढ़ा जा रहा था,
रास्ते के पत्थरों को मार ठोकरे
मैं मायूस सा चला जा रहा था।

दूर से आती दिखी
मोहक सी एक बाला
मैंने अपनी नज़रों का भार उस पर डाला।
जवाब में दूर से ही,
तिरछी नजर मतवाली
उसने बड़े ही मासूमियत से डाली।

इमीडिअट देख रिस्पॉंन्स,
दिल बाग-बाग हो गया
एक अज्ञात प्यार की चाह से
मन बरबस ही खिल गया।

उसे और पास से देखने की चाह ने
रोक दिया हमें थोड़ी देर
उस राह में।
करीब आकर उसने फिर जब
एक भरपूर तिरछी नजर डाली
और मेरे अरमानों की थाली,
पूरी ही छेद डाली।

अभी थोड़ी देर पहले ही जिसे देखकर
गया था मैं हाले जिगर भूल
पर मुझे क्या पता था कि है यह किसका कसूर
मैं मदहोश हो गया था
यह देखकर कि उसकी तो,
आंख ही है तिरछी
कुछ देर पहले ही संजोए सपने
हाल ही ढह गए
और हम पहले की ही तरह
फिर गमजदा रह गए।
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