दूसरा
पहलू
इस
स्तंभ में
सुभद्रा हरण
की कहानी (14
जुलाई) के
संबंध में
हमें पाठकों
के पत्र मिल
रहे हैं। हमने
यह समस्या
पाठकों के
सामने रखी थी
कि भाई होकर भी
कृष्ण ने
अर्जुन को
सुभद्रा को
लेकर भाग जाने
के लिए क्यों
उकसाया था। इस
समस्या से
संबंध में आए
कुछ और पत्र
:
कलयुग
का
अमृत
अर्जुन
द्वारा
सुभद्रा का
हरण असल में
अर्जुन का
सुभद्रा के
प्रति प्रेम
का सूचक है। इस
बारे में ओशो
कहते हैं कि
प्रेम एक ऐसी
अनुभूति है, जो
चखे सो जाने।
इस जगत का अमृत
है- प्रेम। इस
युग के लोग
प्रेमियों के
प्रति उदार
नहीं हैं।
उन्हें नीची
नजर से देखा
जाता है। यह
परिवर्तन
संभवत: इसलिए
आया है,
क्योंकि हम
प्रेम करना
(लेन देन) तो
जानते हैं, पर
प्रेम में
होना बने रहना
शायद भूल गए
हैं।
रजनी
मेहरा, नई
दिल्ली
नीतिज्ञ
और दूरदर्शी
श्रीकृष्ण
बुद्धि
के चार विलास
क्षेत्र हैं,
जहां बुद्धि
रमण करती है।
ये हैं धर्म,
ज्ञान,
ऐश्वर्य और
वैराग्य।
श्रीकृष्ण
में इन चारों
की पूर्णता
स्पष्ट
प्रतीत होती
है। वस्तुत:
भगवान
श्रीकृष्ण का
अवतार धर्म की
स्थापना के
लिए ही हुआ था।
उनका
प्रत्येक
कार्य धर्म की
कसौटी है।
उनके सभी
चरित्र शुद्ध
और सात्विक
हैं। पर इसके
उलट हम देखते
हैं कि
युधिष्ठिर
महाराज के
यज्ञ में
आगंतुकों के
चरण
प्रक्षालन का
काम उन्होंने
किया।
महाभारत में
वे अर्जुन के
सारथी बने।
इससे बढ़कर
निरअभिमानिता
और क्या हो
सकती है?
मर्यादा
पुरुषोत्तम
राम ने अपने
पिता की आज्ञा
मान कर राज्य
छोड़ दिया,
किंतु यह
देखें कि
कृष्ण ने क्या
किया?
कंस
का वध करने के
पश्चात जब सभी
ने भगवान
कृष्ण से
मथुरा का
राज्य ग्रहण
करने का
अनुरोध किया,
तब उन्होंने
यह कहकर
प्रस्ताव
स्वीकार करने
से इनकार कर
दिया कि हमारे
पूर्व पुरुष
यदु से महाराज
ययाति ने वंश
परंपरा तक के
लिए
राज्याधिकार
छीन लिया है-
इसलिए हम राजा
नहीं हो सकते।
यानी
उन्होंने
पूर्व पुरुष
की परोक्ष
आज्ञा का
सम्मान करते
हुए राज्य
छोड़ दिया।
इससे उनका
धार्मिक
आदर्श राम की
तुलना में
ज्यादा ऊंचा
सिद्ध होता
है। एक और
उदाहरण
देखिए।
उन्होंने
शिशुपाल की
माता को
शिशुपाल के सौ
अपराध सहन
करने का वचन दे
दिया।
यज्ञ
सभा में
शिशुपाल के
कटु भाषण पर
वहां उपस्थित
तटस्थ लोगों
को क्रोध आ
गया, लेकिन
कृष्ण सौ
अपराधों की
पूर्ति तक चुप
रहे। इसके बाद
भी उन्होंने
शिशुपाल का वध
किया। धर्म का
स्वरूप देश,
काल, पात्र
सापेक्ष होता
है। एक समय एक
के लिए जो धर्म
है, भिन्न अवसर
पर व भिन्न
व्यक्ति के
लिए वह अधर्म
हो जाता है।
इसकी मिसाल है
कर्ण-अर्जुन
युद्ध में
कर्ण को यह
फटकार सुनाना
कि जिसने अपने
जीवन के किसी
आचरण में धर्म
का आदर नहीं
किया, उसे
दूसरों से
अपने लिए
धर्माचरण की
आशा करने का
क्या अधिकार
है? इसके अलावा
कालयवन का
अकारण मथुरा
पर चढ़ाई के
समय उसे धोखा
देना, रथ-चक्र
लेकर भीष्म के
सम्मुख
दौड़ना और
धर्म के
यथार्थ
स्वरूप की
व्याख्या
करना साबित
करता है कि
श्रीकृष्ण
धर्म के पूर्ण
ज्ञाता हैं।
धर्म के साथ
नीति का क्या
स्थान है,
कहां-कहां
नीति को
प्रधानता
देनी चाहिए और
कहां-कहां
धर्म को,
उन्होंने इन
बातों को
अच्छी तरह
स्पष्ट किया
है। चूंकि, आज
का पढ़ा-लिखा
वर्ग भी इस
व्यवस्था को
भूल गया है,
इसलिए धर्म को
हौवा माना
जाने लगा है।
सुभद्रा का
हरण धर्म
अवतारी,
नीतिज्ञ और
दूरदर्शी
श्रीकृष्ण ने
ही करवाया।
इसी का परिणाम
था कि महाभारत
युद्ध में
जयद्रथ की
मृत्यु हुई और
यह आशंका खत्म
हुई कि एक दिन
वह पांडवों पर
भारी पडे़गा।
इस तरह धर्म की
विजय
हुई।
महेंद्र
महादेव, इंद्र
इंकलेव, नई
दिल्ली
कृष्ण
की
चाल
कृष्ण
ने अपने
दरबारियों और
योद्धाओं को
बताया कि
अर्जुन
होनहार और
बलवान है। वह
हमें पराजित
करके अपमानित
भी कर सकता है।
इसलिए क्यों
ना हम स्वयं
सुभद्रा का
विवाह अर्जुन
से करा दें। यह
कृष्ण की
प्यार को
जोड़ने की चाल
थी। सुभद्रा
और अर्जुन का
विवाह कराना
कृष्ण की अपनी
कूटनीति थी।
इसलिए लोगों
को दिखाने के
लिए कृष्ण
सामाजिक स्तर
पर कमजोर बन
गए। लेकिन
इसका आशय यह
नहीं कि
अर्जुन के आगे
कृष्ण कमजोर
थे। हर युग में
दुनिया के
कायदे-कानून
व्यक्ति के
सामाजिक स्तर
पर ही निर्भर
रहे हैं और आज
भी हैं। यदि
वही अर्जुन
गरीब होता या
सामाजिक
प्रतिष्ठा
प्राप्त नहीं
होता और
सुभद्रा से
प्रेम कर
बैठता और
सुभद्रा भी, तो
क्या
श्रीकृष्ण
अर्जुन को हरण
के लिए कहते?
और द्वारिका
वासी उन्हें
बगैर दंड दिए
छोड़ देते?
हरगिज नहीं।
आज भी
निर्धन वर्ग
और उच्च वर्ग
में प्रेम के
औचित्य
निर्धारण में
असमानता कायम
है और समाज ने
श्रीकृष्ण का
ही अनुसरण
किया है। एक
संपन्न वर्ग
का लड़का किसी
संपन्न वर्ग
की लड़की से
विवाह करना
चाहता है या
प्रेम करता है,
तो आज भी लोगों
में प्रेमी और
प्रेमिका के
प्रति उदारता
दिखती है,
लेकिन उनका
संबंध निर्धन
वर्ग से हो तो
यही उदारता
छूमंतर हो
जाती है।
मामला कहीं
अंतरजातीय
विवाह का हो तो
दंगे और
मारकाट भी हो
जाती है। आज के
लोकतंत्र में
भी सामाजिक
व्यवस्था,
व्यक्ति के
ओहदे पर
केंद्रित
है।
सैयद
परवेज, बदरपुर,
नई दिल्ली