यज्ञ
शर्मा
आजकल
आतंकवाद पर
दो बहस चालू
हैं। एक देश
में, दूसरी
चंडूखाने
में। देश में
वैसी, जैसी इस
देश में होती
है। चंडूखाने
में वैसी, जैसी
चंडूखाने में
होती है। इसका
मतलब यह नहीं
है कि
चंडूखाने की
बहस गंभीर
नहीं होती।
कोई और माने या
न माने,
चंडूखाने के
लोग तो उसे
गंभीर ही
मानते हैं। यह
बात अलग है कि
चंडूखाने में
एक-दो सुट्टे
लगाने के बाद
ही गंभीर हुआ
जा सकता है।
वैसे यह सच है
कि कई बार आदमी
नशे में
ज्यादा सच
बोलता
है।
चंडूखाने
में बहस करने
का एक निश्चित
तरीका है।
पहले चिलम
सुलगाई जाती
है, फिर दो-चार
कश लगाए जाते
हैं, तब अफीमची
बहस के मूड में
आते हैं। तो,
एक अफीमची ने
सुट्टा लगा कर
चिलम दूसरे को
थमा दी और बहस
की शुरुआत की-
यार, ये
आतंकवादी बम
क्यों फोड़ते
हैं? सवाल
गंभीर था,
इसलिए दूसरे
अफीमची ने
गंभीरता से
जवाब दिया-
क्योंकि, उनके
पास बम होते
हैं। हम लोग बम
क्यों नहीं
फोड़ते?
क्योंकि,
हमारे पास बम
नहीं है, चिलम
है।
हम लोग
चिलम फोड़ दें
तो? उससे क्या
होगा? अपना ही
नुकसान हो
जाएगा। बम
फोड़ने में
आतंकवादियों
को नुकसान
नहीं होता?
नहीं रे,
उन्हें बम
फोकट में
मिलते हैं। पर
कोई-कोई
आतंकवादी तो
आत्मघाती
होता है। जब वह
मरता है, तब तो
उसको नुकसान
होता है न?
आदमी की तरह
देखो तो होता
है, बम की तरह
देखो तो नहीं
होता। क्या
मतलब? मतलब यह
कि जो
आत्मघाती
होता है, वह
खुद बम बन कर
जाता है। ऐसा
बम जो किसी और
के इशारे पर
फटता है। जो
इशारा करता है,
उसका नुकसान
नहीं होता।
उसके लिए तो बम
और फोड़ने
वाला दोनों
फोकट के होते
हैं।
इतनी
चर्चा
होते-होते
चिलम का मसाला
खत्म हो गया।
अफीमचियों ने
टीवी स्टाइल
में ब्रेक ले
लिया। चिलम को
फिर से
सुलगाया गया,
दो-चार सुट्टे
लगाए गए। बहस
फिर से चालू हो
गई। एक ने कहा-
लोग कहते हैं
कि बम धमाकों
में
पाकिस्तान का
हाथ है।
पाकिस्तान
कहता है, पहले
सबूत लाओ फिर
आरोप लगाओ।
दूसरे ने कहा-
ठीक ही तो
बोलता है।
क्या ठीक
बोलता है? कोई
आतंकवादी साथ
में सबूत ले कर
आता है क्या?
असली
पाकिस्तानी
होगा तो जरूर
लाएगा।
पाकिस्तानी
आतंकवादी
बेवकूफ होता
है क्या? कोई
आतंकवादी
बेवकूफ होता
है या नहीं, यह
तो सोचने की
बात है। लेकिन,
पाकिस्तानी
आतंकवादी
खुद्दार होता
है। अगर वह बम
फोड़ने आएगा
तो साथ में
सबूत जरूर
लाएगा।
क्योंकि सबूत
नहीं मिला तो
लोग उसे
हिन्दुस्तानी
मान लेंगे जो
उसे बिल्कुल
गवारा नहीं
होगा।
जब
उन्हें
हिन्दुस्तान
ही पसंद नहीं
है, तो
हिन्दुस्तानी
कहलाना कैसे
पसंद आएगा? तो
तुम मानते हो
कि बम का धमाका
करने वाले हाथ
पाकिस्तान के
नहीं हैं।
मुझे तो ऐसा ही
लगता है।
क्योंकि अब
अपने मुल्क
में आतंकवाद
का इतना विकास
हो चुका है कि
पाकिस्तान की
ओर हाथ बढ़ाने
की कोई जरूरत
नहीं है। बस
इशारा काफी
है। यार, यह बम
फोड़ने का
इशारा कैसे
किया जाता
होगा? दुनिया
में इशारे
करने के बहुत
से तरीके हैं-
आंख मारी जा
सकती है, सीटी
बजाई जा सकती
है, और याद है न
उस क्रिकेट
कोच ने क्या
किया था, बीच
की उंगली
दिखाई थी। पर,
ये सब तो घटिया
इशारे हैं। तो,
आतंकवादी कौन
से बढ़िया
इंसान होते
हैं।
अच्छा,
यह बताओ,
आतंकवादी
तैयार कैसे
किए जाते हैं?
सुना है उनकी
ब्रेन वॉशिंग
की जाती है।
सुना तो यही
है, लेकिन उसे
वॉशिंग नहीं
कहना चाहिए।
क्यों?
क्योंकि,
वॉशिंग करने
से तो चीज साफ
होती है जबकि
आतंकवादियों
के दिमाग गंदे
होते हैं। अगर
ब्रेन वॉशिंग
नहीं कह सकते
तो फिर क्या
कहें ब्रेन
गटरिंग?
आप
सोच रहे होंगे
कि यहां
खाली-पीली
चंडूखाने की
बहस क्यों लगा
रखी है? इससे
क्या हल
निकलेगा? यह
सवाल तो देश
में होने वाली
हर बहस के बारे
में पूछा जा
सकता है। बहस
से हल निकल
सकता है,
बशर्ते वह हल
निकालने के
लिए की जाए।
लेकिन देश में
कई बहस समस्या
का हल ढूंढने
के लिए नहीं,
टाइम पास करने
के लिए की जाती
हैं।
चंडूखाने की
तरह!