सुजाता
दुआ,
दिल्ली
लोग
कहते हैं
कि
इंसानियत मर
चुकी है, मैं
भी यही मानती
थी पर एक दिन
कुछ ऐसा हुआ की
उससे मेरी सोच
बदल गई। उस दिन
मौसम काफ़ी
गरम था पर मझे
कुछ ज़रूरी
किताबें लानी
थीं, इसलिए मैं
बाजार गई थी,
अचानक मझे तेज
बुखार हो गया।
तबीयत बहुत
खराब हो गई,
तेज चक्कर आने
लगे। मैं
काफ़ी डर गई थी
क्योंकि मैं
घर से बहुत दूर
थी, अब घर कैसे
जाऊंगी।
घहबराहट से
पसीने भी आ रहे
थे। एक रिक्शे
को हाथ दिया
और कहा कि मझे
मेन रोड तक
छोड़ दें, ताकि
मैं ऑटो ले
सकूं।
रिक्शावाला
कोई 50 की उमर का
रहा होगा।
मुझे पसीने से
तर-बतर देखकर
वह पहले तो
पानी ले आया
फिर मझे थोड़ी
देर छाया में
बैठने को कहकर
रिक्शा वहीं
खड़ा कर ना
जाने कहां
गया। मैं
आज्ञाकारी
बच्चे की तरह
वहीं बैठी
रही। थोड़ी ही
देर में वह एक
अख़बार लेकर
आया और मझे
पंखा करने
लगा। पता नहीं
पंखे की हवा से
या उसके स्नेह
की ठंडक से, पर
कुछ देर बाद
मेरी तबीयत
संभल गई। फिर
मझे वह मेन रोड
तक ले गया। ऑटो
वाले से
मोलभाव किया
और मुझे उसमें
बिठा दिया। जब
तक ऑटो चला
नहीं गया वहीं
खड़ा रहा। मैं
आज भी जब कभी
उस मार्किट
में जाती हूं
तो मेरी आंखें
उसी इंसान को
खोजती हैं।
मैं तो उसकी
ऋणी हो गई।
काश, ईश्वर एक
बार फिर उस
फरिश्ते से
मिलवा दे। अब
मानती हूं कि
इंसानियत अभी
मरी नहीं हैं,
सांसे अभी
बाकी हैं।