गरिमा
मुझे
बचपन से
ही
घूमने का खूब
शौक था। घर में
सबसे छोटी
होने की वजह से
मां मुझे हर
जगह ले जाती
थी। लेकिन
जैसे-जैसे
बड़ी होती गई,
घूमना-फिरना
कम हो गया।
कॉलिज में आने
के बाद तो
दिल्ली से
बाहर कहीं
जाना तो
बिल्कुल बंद
हो गया। बचपन
में पापा से
अमृतसर स्थित
हरमंदिर साहब
(गोल्डन टेंपल)
के बारे में
खूब किस्से
सुनती थी।
पापा बताते थे
कि यह स्वर्ण
मंदिर सिखों
का बहुत बड़ा
गुरुद्वारा
है। वहां
सच्चे मन से की
गई अरदास
हमेशा पूरी
होती है। मेरा
मन वहां जाने
को बहुत
व्याकुल रहता
था। एक बार
मेरे
अंकल-आंटी ने
वहां जाने का
प्रोग्राम
बनाया। उनकी
बेटी भी साथ
में जाने वाली
थी। उन्होंने
हम से भी वहां
चलने के लिए
कहा, लेकिन
पापा ने मना कर
दिया। फिर
मैंने अपने
लिए पापा से
पूछा, तो पापा
ने कुछ देर
सोच-विचार के
बाद मुझे जाने
की इजाजत दे
दी।
पंजाब
के अमृतसर शहर
में स्थित
गुरुद्वारे
स्वर्ण मंदिर
की विशेष
महत्ता है। यह
गुरुद्वारा
एक बड़े सरोवर
के बीचोबीच
स्थित है। इस
गुरुद्वारे
का बाहरी
हिस्सा सोने
का बना हुआ है,
इसलिए इसे
गोल्डन टेंपल
अथवा स्वर्ण
मंदिर के नाम
से भी जाना
जाता है।
हरमंदिर
साहिब को
दरबार साहिब
के नाम से भी
ख्याति हासिल
है। यूं तो यह
सिखों का
गुरुद्वारा
है, लेकिन इसके
नाम में मंदिर
शब्द का
जुड़ना यह
स्पष्ट करता
है कि हमारे
देश में सभी
धर्मों को एक
समान माना
जाता है।
इतना ही
नहीं, हरमंदिर
साहिब की नींव
भी एक मुसलमान
ने ही रखी थी।
इतिहास के
मुताबिक
सिखों के
पांचवें गुरु
अर्जुन देव जी
ने लाहौर के एक
सूफी संत से
दिसंबर, 1588 में
गुरुद्वारे
की नींव रखवाई
थी।
लगभग 400
साल पुराने इस
गुरुद्वारे
का नक्शा खुद
अर्जुन देव ने
तैयार किया
था। यह
गुरुद्वारा
शिल्प
सौंदर्य की
अनूठी मिसाल
है। इसकी
नक्काशी और
बाहरी
सुंदरता
देखते ही बनती
है।
गुरुद्वारे
के चारों ओर
दरवाजे हैं, जो
चारों दिशाओं
(पूर्व,
पश्चिम, उत्तर,
दक्षिण) में
खुलते हैं। उस
समय भी समाज
चार जातियों
में विभाजित
था और कई
जातियों के
लोगों को अनेक
मंदिरों आदि
में जाने की
इजाजत नहीं थी,
लेकिन इस
गुरुद्वारे
के यह चारों
दरवाजे उन
चारों
जातियों को
यहां आने के
लिए आमंत्रित
करते थे। यहां
हर धर्म के
अनुयायी का
स्वागत किया
जाता
है।
गुरुद्वारे
के आसपास
स्थित कुछ ऐसी
जगहें जो
दर्शनीय हैं।
गुरुद्वारे
के बाहर दाईं
ओर अकाल तख्त
है। अकाल तख्त
का निर्माण सन
1606 में किया गया
था। यहां
दरबार साहिब
स्थित है। उस
समय यहां कई
अहम फैसले लिए
जाते थे।
संगमरमर से
बनी यह इमारत
देखने योग्य
है। इसके पास
शिरोमणि
गुरुद्वारा
प्रबंधक
कमिटी का
दफ्तर है, जहां
सिखों से
जुड़े कई
महत्वपूर्ण
फैसले लिए
जाते
हैं।
पास
में बाबा अटल
नामक स्थान पर
एक नौमंजिला
इमारत भी है।
बताते हैं कि
हरगोविंद
सिंह के बेटे
अटल राय का
जन्म इसी
इमारत में हुआ
था। उन्हीं की
याद में इस जगह
का नाम बाबा
अटल रखा गया।
गुरु का लंगर
में
गुरुद्वारे
आने वाले
श्रद्धालुओं
के लिए
खाने-पीने की
पूरी
व्यवस्था
होती है। यह
लंगर
श्रद्धालुओं
के लिए 24 घंटे
खुला रहता है।
खाने-पीने की
व्यवस्था
गुरुद्वारे
में आने वाले
चढ़ावे और
दूसरे फंडों
से होती है।
लंगर में
खाने-पीने की
व्यवस्था
शिरोमणि
गुरुद्वारा
प्रबंधक
कमिटी की ओर से
नियुक्त
सेवादार करते
हैं। वे यहां
आने वाले
लोगों (संगत)
की सेवा में हर
तरह से योगदान
देते हैं।
अनुमान है कि
करीब 40 हजार
लोग रोज यहां
लंगर का
प्रसाद ग्रहण
करते हैं।
सिर्फ भोजन ही
नहीं, यहां
श्री गुरु
रामदास सराय
में
गुरुद्वारे
में आने वाले
लोगों के लिए
ठहरने की
व्यवस्था भी
है। इस सराय का
निर्माण सन 1784
में किया गया
था। यहां 228
कमरे और 18 बडे़
हॉल हैं। यहां
पर रात
गुजारने के
लिए गद्दे व
चादर मिल जाती
है। एक
व्यक्ति की
तीन दिन तक
ठहरने की
पूर्ण
व्यवस्था
है।
यहां
दुमंजली बेरी
नामक एक स्थान
भी है। इसके
बारे में
किंवदंती है
कि एक बार एक
पिता ने अपनी
बेटी का विवाह
कोढ़ ग्रस्त
व्यक्ति से कर
दिया। उस
लड़की को यह
विश्वास था कि
हर व्यक्ति के
समान वह कोढ़ी
व्यक्ति भी
ईश्वर की दया
पर जीवित है।
वही उसे खाने
के लिए सब कुछ
देता है। एक
बार वह लड़की
शादी के बाद
अपने पति को
इसी तालाब के
किनारे
बैठाकर गांव
में भोजन की
तलाश के लिए
निकल गई। तभी
वहां अचानक एक
कौवा आया, उसने
तालाब में
डुबकी लगाई और
हंस बनकर बाहर
निकला। ऐसा
देखकर
कोढ़ग्रस्त
व्यक्ति बहुत
हैरान हुआ।
उसने भी सोचा
कि अगर में भी
इस तालाब में
चला जाऊं, तो
कोढ़ से निजात
मिल जाएगी।
उसने तालाब
में छलांग लगा
दी और बाहर आने
पर उसने देखा
कि उसका कोढ़
नष्ट हो गया।
यह वही सरोवर
है, जिसमें आज
हरमंदिर
साहिब स्थित
है। तब यह छोटा
सा तालाब था,
जिसके चारों
ओर बेरी के
पेड़ थे।
तालाब का आकार
तो अब पहले से
काफी बड़ा हो
गया है, तो भी
उसके एक
किनारे पर आज
भी बेरी का
पेड़ है। यह
स्थान बहुत
पावन माना
जाता है। यहां
भी श्रद्धालु
माथा टेकते
हैं।
परंपरा
यह है कि यहां
वाले
श्रद्धालुजन
सरोवर में
स्नान करने के
बाद ही
गुरुद्वारे
में मत्था
टेकने जाते
हैं। जहां तक
इस विशाल
सरोवर की
साफ-सफाई की
बात है, तो
इसके लिए कोई
विशेष दिन
निश्चित नहीं
है। लेकिन
इसका पानी
लगभग रोज ही
बदला जाता है।
इसके लिए वहां
फिल्टरों की
व्यवस्था है।
इसके अलावा
पांच से दस साल
के अंतराल में
सरोवर की पूरी
तरह से सफाई की
जाती है। इसी
दौरान सरोवर
की मरम्मत भी
होती है। इस
काम में एक
हफ्ता या उससे
भी ज्यादा समय
लग जाता है। यह
काम यानी
कारसेवा
मुख्यत:
सेवादार करते
हैं, पर उनके
अलावा आम संगत
भी इसमें
बढ़-चढ़कर
हिस्सा लेती
है।
अमृतसर
दिल्ली से 500
किलोमीटर दूर
है। पुरानी
दिल्ली और नई
दिल्ली से
अमृतसर
शान-ए-पंजाब
ट्रेन से
पहुंचा जा
सकता है। यह
ट्रेन छह से
सात घंटे में
अमृतसर
पहुंचा देती
है। अमृतसर
स्टेशन से
रिक्शा करके
गुरुद्वारे
पहुंचा जा
सकता
है।
वैसे तो
गुरुद्वारे
में रोज ही
श्रद्धालुओं
का तांता लगा
रहता है, लेकिन
गर्मियों की
छुट्टियों
में ज्यादा
भीड़ होती है।
बैसाखी,
लोहड़ी,
गुरुनानक
पर्व, शहीदी
दिवस, संगराद
जैसे
त्योहारों पर
पैर रखने की
जगह नहीं होती
है। यहां
सच्चे मन से
अरदास करने से
सारी इच्छाएं
पूर्ण हो जाती
हैं। इसके
अलावा सुखा
आसान और
प्रकाशोत्सव
का नजारा
देखने लायक
होता है।
प्रकाशोत्सव
अल सुबह ढाई
बजे से आरंभ
होता है, जब
गुरुग्रंथ
साहिब जी को
उनके कक्ष से
गुरुद्वारे
में लाया जाता
है। संगतों की
टोली
भजन-कीर्तन
करते हुए गुरु
ग्रंथ साहिब
को
गुरुद्वारे
में लाती है।
रात के समय
सुखा आसन के
लिए गुरु
ग्रंथ को कक्ष
में भी वापस भी
इसी तरह लाया
जाता है।
कड़ाह प्रसाद
(हलवे) की
व्यवस्था भी 24
घंटे रहती
है।
गुरुद्वारे
के आसपास कई
अन्य
महत्वपूर्ण
स्थान हैं।
थारा साहिब,
बैर बाबा
बुड्ढा जी,
गुरुद्वारा
लाची बार,
गुरुद्वारा
शहीद बंगा
बाबा दीप सिंह
जैसे छोटे
गुरुद्वारे
स्वर्ण मंदिर
के आसपास
स्थित हैं।
उनकी भी अपनी
महत्ता है।
नजदीक ही
ऐतिहासिक
जालियांवाला
बाग है, जहां
जनरल डायर की
क्रूरता की
निशानियां
मौजूद हैं।
वहां जाकर
शहीदों की
कुर्बानियों
की याद ताजा हो
जाती है।
गुरुद्वारे
से कुछ ही दूरी
पर भारत-पाक
सीमा पर स्थित
वाघा बार्डर
एक अन्य
महत्वपूर्ण
जगह है। यहां
दोनों ओर की
सेनाएं अपने
देश का झंडा
सुबह फहराने
और शाम को
उतारने का
आयोजन करती
हैं। इस मौके
पर परेड भी
होती है।