रंजीत
कुमार
नई
दिल्लीः
भारत और
अमेरिका के
बीच परमाणु
सहयोग समझौते
को मंजूरी
देने वाला
विधेयक (एचआर-7081)
अमेरिकी
सेनेट में
भारतीय
समयानुसार
बुधवार शाम
पेश हो गया।
उम्मीद है कि
भारतीय
समयानुसार
गुरुवार सुबह
तक यह
प्रस्ताव
पारित हो
जाएगा। सेनेट
में पारित
होने वाला यह
विधेयक कुछ
शर्तों के साथ
होगा जिसे दूर
करने के लिए
अमेरिकी
राष्ट्रपति
अपने
हस्ताक्षर
वाला एक विशेष
बयान जारी
करेंगे।
अमेरिका
की अग्रणी
विचार संस्था
वुड्रो
विल्सन सेंटर
के निदेशक
रॉबर्ट एम.
हाथवे ने यहां
एक विशेष
बातचीत में
भारत के
राजनयिक और
परमाणु हलकों
में पैदा
शंकाओं को दूर
करते हुए कहा
कि अमेरिकी
राष्ट्रपति
अमेरिकी
कांग्रेस
द्वारा पारित
किसी भी
विधेयक के
प्रभावों को
निरस्त करने
के लिए अपनी ओर
से एक विशेष
बयान जारी
करने का
अप्रत्याशित
कदम उठा सकते
हैं।
अमेरिकी
शब्दावली में
इसे 'साइनिंग
स्टेटमंट'
कहते हैं।
अमेरिकी
राष्ट्रपति
द्वारा इस तरह
का बयान
दुर्लभ
मामलों में ही
जारी किया
जाता है, जो
अमेरिका के
राष्ट्रीय
कानून की तरह
माना जाता है।
हालांकि इस
तरह के विधेयक
को अमेरिकी
कांग्रेस में
कोई सदस्य
चुनौती दे
सकता है, लेकिन
इसे दो तिहाई
बहुमत से
पारित करवाने
के बाद ही
निरस्त किया
जा सकता
है।
रॉबर्ट
हाथवे ने कहा
कि
राष्ट्रपति
बुश ने अपने
कार्यकाल में
कई बार
साइनिंग
स्टेटमंट
जारी करने के
विवादस्पद
कदम उठाए हैं,
इसलिए भारत के
साथ 123 समझौते
वाले विधेयक
के लिए भी इस
तरह का
साइनिंग
स्टेटमंट
जारी करने पर
अमेरिकी
सामरिक हलकों
में ऐतराज
किया जा सकता
है। लेकिन
अमेरिकी
राष्ट्रपति
भारत के साथ
परमाणु सहयोग
का सिलसिला
अपने
कार्यकाल में
ही शुरू करने
के लिए
प्रतिबद्ध
हैं, इसलिए वह
भारत के साथ 123
समझौते को
पिछले साल
अगस्त में हुई
सहमति के
अनुरूप जारी
करने का फैसला
कर चुके हैं। 25
सितंबर को
वॉशिंगटन में
प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह
के साथ
मुलाकात के
दौरान भी
राष्ट्रपति
बुश ने वादा
किया था कि
भारत के साथ
परमाणु सहयोग
का समझौता
भारत और
अमेरिका को
संतुष्ट करने
वाला ही
होगा।
बुधवार
को सेनेट में
जो विधेयक पेश
किया गया, वह
प्रतिनिधि
सभा में पारित
विधेयक के
समान है इसलिए
सेनेट में
पारित होने
वाले विधेयक
में भी कई
शर्तें
होंगी। ये
शर्तें
भारत-अमेरिका
द्विपक्षीय 123
परमाणु
समझौते के
दायरे से बाहर
होंगी। इस
विधेयक में
भारत के साथ
परमाणु सहयोग
के लिए कई
शर्तों को
जोड़ा जाने
वाला है, इसलिए
इसे जब तक
निरस्त नहीं
किया जाएगा तब
तक
भारत-अमेरिका
के साथ परमाणु
सहयोग का
समझौता नहीं
कर
सकेगा।
रॉबर्ट
हाथवे के
मुताबिक
राष्ट्रपति
बुश ने भारत के
साथ सामरिक
साझेदारी के
संबंधों को
मजबूत करने के
लिए ही यह
अप्रत्याशित
कदम उठाने का
फैसला किया
है। सेनेट में
सदन के दो
डेमॉक्रैट
सदस्यों
बाइरन डोर्गन
और जेफ
बिंगामन ने
परमाणु
समझौते के
विधेयक में दो
संशोधन पेश
किए हैं,
जिसमें यह
सुनिश्चित
करने को कहा
गया है कि भारत
को अमेरिकी
परमाणु
निर्यात किसी
भी तरह भारत के
परमाणु
हथियार
कार्यक्रम
में मददगार
नहीं बने।
संशोधन में यह
शर्त शामिल है
कि भारत यदि
परमाणु
परीक्षण करता
है तो भारत में
लगे अमेरिकी
परमाणु
रिएक्टरों को
सभी तरह के
परमाणु
साजोसामान और
ईंधन की
सप्लाई रोक दी
जाएगी।
प्रतिनिधि
सभा में किसी
विधेयक को
पारित होने के
लिए दो तिहाई
बहुमत की
जरूरत होती है,
लेकिन सेनेट
में केवल
स्पष्ट बहुमत
से ही काम
चलेगा। चूंकि
सेनेट की
विदेशी संबंध
समिति ने
परमाणु
समझौते को
पहले ही पारित
कर दिया है,
इसलिए सेनेट
की पूर्ण बैठक
में इसका
पारित होना
औपचारिकता भर
है।
लेकिन
प्रतिनिधि
सभा और सेनेट
में पारित
विधेयकों में
जिस तरह की
शर्तें जोड़ी
गई हैं इसे
लेकर भारतीय
सामरिक हलकों
में चिंता
व्याप्त है।
यहां सूत्रों
का कहना है कि
अमेरिकी
प्रशासन को
पता है कि भारत
123 समझौते के
दायरे से बाहर
जाकर अमेरिका
के साथ कोई
समझौता नहीं
कर सकता, इसलिए
बुश इस विधेयक
में भारत के
लिए
आपत्तिजनक
लगने वाले
पहलुओं को
निरस्त करने
के लिए
साइनिंग
स्टेटमंट
जारी करेंगे।
यह स्टेटमंट
अमेरिका का
कानून माना
जाएगा और यह
अमेरिका के
घरेलू हाइड
कानून को भी
बेअसर कर सकता
है।