वॉशिंगटनः
सेनेट के
भारत-अमेरिका
न्यूक्लिअर
डील पर बुधवार
रात (भारतीय
समयानुसार
करीब साढ़े 6
बजे) मुहर
लगाने के साथ
ही भारत के साथ
अमेरिकी
परमाणु
व्यापार पर
करीब 3 दशक से
लगी पाबंदी
खत्म हो गयी
है।
अमेरिकी
कांग्रेस के
उच्च सदन
सेनेट ने 13 के
मुकाबले 86
मतों से पारित
कर डील को साइन
के लिए
राष्ट्रपति
जॉर्ज बुश के
पास भेज
दिया।
सेनेट
ने यह कदम
अमेरिकी
विदेशमंत्री
कोंडोलीजा
राइस के इस
हफ्ते भारत के
संभावित दौरे
से पहले उठाया
है। बुश की
विदेश नीति की
शीर्ष
प्राथमिकताओं
में से एक इस
न्यूक्लिअर
डील को
अमेरिकी
कांग्रेस के
निचले सदन
हाउस ऑफ
रेप्रजेंटटिव
ने 28 सितंबर को
पहले ही पारित
कर दिया था।
बुश प्रशासन
का मानना है कि
भारत-अमेरिकी
सिविल
न्यूक्लिअर
डील को
अमलीजामा
पहनाने के बाद
भारत की ऊर्जा
जरूरतें पूरी
होने के साथ
अरबों रुपये
का परमाणु
बाजार खुल
जाएगा।
हालांकि
कुछ आलोचकों
का कहना है कि
भारत को
परमाणु ईंधन
और तकनीक आयात
करने की छूट
दिए जाने के
बाद परमाणु
हथियारों के
प्रसार पर रोक
लगाने के
प्रयासों को
नुकसान
पहुंचेगा
क्योंकि उसने
परमाणु
अप्रसार संधि
पर हस्ताक्षर
नहीं करने के
बाद भी परमाणु
परीक्षण किए
हैं।
इससे
पहले विधेयक
पर काफी लंबी
बहस हुई। बहस
के दौरान
समन्वयकों ने
घातक
संशोधनों को
'
गैरजरूरी
'
करार देते हुए
सहयोगियों से
अनुरोध किया
कि वे इस
विधेयक को
अपना समर्थन
दें।
इससे पहले
अपनी शुरुआती
टिप्पणी में
डोड ने भारत
अमेरिका
असैन्य
परमाणु सहयोग
से जुड़े
एचआर-7081 विधेयक
को मंजूरी
देने का अपने
साथियों से
अनुरोध किया।
सेनेट में
विधेयक पर बहस
होने से पहले
डेमॉक्रैटिक
सेनेटर बेरोन
डोर्गन और जेफ
बिंगमैन ने दो
संशोधन पेश
किए।
हाउस
ऑफ
रेप्रज़ेटटिव
से पहले ही
मंजूरी पा
चुके विधेयक
के एक पैरा में
उल्लेख है कि
अगर भारत
परीक्षण करता
है, तो अमेरिका
परमाणु सहयोग
रद्द कर सकता
है। डोर्गन
द्वारा
प्रस्तावित
संशोधन कहता
है कि इस कानून
के प्रभावी
होने की तारीख
के बाद अगर
भारत सरकार
परमाणु
विस्फोटक
उपकरण से
परीक्षण करता
है, तो कानून
के किसी अन्य
प्रावधान के
बावजूद
अमेरिका
समझौते के तहत
भारत को
प्रौद्योगिकी
का हस्तांतरण
अथवा कोई
उपकरण या
सुविधा नहीं
दे सकता।