दौहित्र से वंश क्यों नहीं चल सकता? -रति पर्व-धर्म-दर्शन-Navbharat Times
 
दौहित्र से वंश क्यों नहीं चल सकता?
10 Oct 2008, 2359 hrs IST,नवभारत टाइम्स  
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इस स्तंभ के 11 अगस्त के अंक में हमने चित्रवाहन की बेटी चित्रांगदा की कहानी दी थी, जिसके रूप पर आसक्त हो कर अर्जुन ने उससे विवाह का प्रस्ताव रखा था। लेकिन उसके पिता ने यह शर्त रखी कि अर्जुन, उनके वंश के लिए चित्रांगदा के संयोग से पुत्र उत्पन्न करेंगे। चित्रवाहन को एक ही संतान थी और उससे वे अपने वंश के लिए उत्तराधिकारी प्राप्त करना चाहते थे। ऐसे उत्तराधिकार के लिए उस समय 'पुत्रिका धर्म' का प्रचलन था। अर्जुन चित्रांगदा के लिए अत्यंत व्याकुल थे, इसलिए उन्होंने यह शर्त मान ली।

इस कथा के बाद हमने प्रश्न रखा था कि जब हमारे शास्त्रों में दौहित्र को वंश मानने की परंपरा रही है, तो फिर आज हम सिर्फ बेटे से उत्पन्न बेटे को ही अपना वंश या उत्तराधिकारी क्यों मानते हैं और दौहित्र को बराबर का दर्जा क्यों नहीं देते?

आश्चर्यजनक रूप से सूर्य तथा पृथा के समागम या उर्वशी के प्रणय निवेदन से संबंधित सवाल पर जितने पाठकों ने हमें पत्र भेजे, उतने पत्र हमें दौहित्र और उत्तराधिकार के मसले पर नहीं मिले। सेक्स या समागम के मामले में सूर्य, कुंती, अर्जुन और उर्वशी जैसे पात्रों की नैतिकता का मूल्यांकन संभवत: उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा रहा। बहरहाल जो पत्र हमें दौहित्र के उत्तराधिकार पर मिले हैं, उनमें से कुछ चुने हुए विचार हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं -

पुत्री में भी पिता का ही अंश

दौहित्र से वंश क्यों नहीं चल सकता (11 अगस्त) को प्रकाशित प्रश्न के बारे में मेरा विचार यह है कि यह चित्रवाहन की सरलता, दूरदर्शिता और परिपक्वता को ही जाहिर करता है कि उन्होंने दौहित्र को भी अपना वंशज स्वीकार किया। उन्होंने इस तरह से आने वाले युगों के लिए एक मानदंड स्थापित किया गया होगा, पर प्राचीन कथाओं व घटनाओं को आधुनिक दृष्टि से देखने के कारण हमारा दृष्टिकोण ही बदल गया है।

सबसे खास बात यह है कि हम पुरानी घटनाओं व इतिहास में केवल कमियां व दोष ही देखते हैं। इस तरह हम खुद ही पूर्वाग्रहों से बुरी तरह ग्रस्त हैं। महाभारत काल के बाद समय-समय पर इतिहास के साथ छल- कपट भी होता रहा। टीकाकारों ने अपनी बुद्धि के अनुसार उसमें छेड़छाड़ की व अर्थ के साथ अनर्थ भी मिला दिया। दौहित्र तो वंशज है ही।

पुत्री में भी तो पिता का ही रक्त होता है और पुत्री व दामाद के रक्त से मिश्रित जन्मी संतान को वंशज स्वीकार करने में कोई हर्ज ही नहीं है। अगर हम दौहित्र को अपना वंशज नहीं मानते हैं, तो इससे हमारा अहंकार ही प्रकट होता है। ऐसा करके हम इतिहास को भी अपमानित कर रहे हैं।

विजय कुमार सिंह भूपेंद्र, गोविंदपुरी, दिल्ली

वंशज है दौहित्र

भारत में वेदों, शास्त्रों और पुराण कथाओं के आधार पर ही आधुनिक समाज के जीवन को जीया जा रहा है। लेकिन हर काल के अनुसार सामाजिक रीतियों तथा तौर- तरीकों में परिवर्तन दिखाई पड़ता है। जहां तक नाती को वंश परंपरा का अंग मानने या नहीं मानने वाली बात है, मुझे लगता है कि उसे आज भी वंश परंपरा का ही हिस्सा माना जाता है। इधर उत्तर भारत में चाहे नहीं हो, लेकिन देश के बहुत से राज्यों में पुत्री को अपने माता-पिता की जमीन- जायदाद में हिस्सा मिलता है। उसकी असमय मृत्यु पर उसके पुत्र- पुत्री उसकी संपत्ति के समान रूप से अधिकारी होते हैं।

नीरज भारद्वाज, पूठ खुर्द, दिल्ली

बेटियों से स्नेह

महिलाएं अपनी बेटियों से ज्यादा स्नेह रखती हैं। उनका अपने नाती-नातिनों और दौहित्र से भी भरपूर स्नेह होता है। मेरे एक क्लाइंट को उसके नाना ने गोद लिया है। सभी कागजात में उसके नाना का नाम ही अभिभावक के रूप में लिखा है। ऐसे हजारों उदाहरण होंगे, पर ऐसे मामले सामने कम आते हैं। हमारे समाज में वंश चलाने के लिए पुत्र होने की बात कहना ठीक है, पर यदि किसी के बेटा नहीं है, तो बेटी और उसके बच्चे ही संपत्ति संभालते हैं।

दौलत और स्नेह का प्रवाह कहीं न कहीं तो होगा ही। महिलाएं अपने सास-ससुर, पति, देवर, जेठ आदि के प्रति चाहे जितना सम्मान प्रकट करें, लेकिन उनका ज्यादा लगाव तो अपनी बेटी और नाती-नातिन से ही होता है।

जीवन कुमार मित्तल, मोती नगर

आपत्ति नहीं

सदियों से भारतीय परिवारों में पुत्रों को महत्व देने की परंपरा रही है। इस प्रवृत्ति का दुष्परिणाम समाज को परिवार के बड़े आकारों (पुत्र की चाह में संतानों की संख्या में वृद्धि) और कन्या भ्रूण हत्या के रूप में भुगतना पड़ा है। ऐसी नीतियों ने ज्यादातर पुत्रों को उदंड बना दिया है। ऐसे पुत्र ही माता-पिता की अवहेलना करते हैं।

बहरहाल, स्त्री-पुरुष की समानता के इस युग में नाती द्वारा वंश चलाए जाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इससे न केवल उपरोक्त समस्याएं दूर होंगी, अपितु उन मां -बाप के लिए यह एक सुखद अहसास होगा, जो अपनी बेटियों पर गर्व तो करते हैं, लेकिन बेटियों को वंश चलाने का श्रेय नहीं दे पाते।

इंदु कपूर, सेक्टर-33, नोएडा

प्रामाणिक नहीं

महाभारत की जब रचना हुई थी, तब उसके श्लोकों की संख्या सीमित थी। वेद व्यास ऋषि थे और उन्होंने महाभारत में केवल वही बातें लिखीं, जो सत्य और प्रामाणिक थीं। बाद के हजारों सालों में महाभारत में बहुत अधिक संख्या में ऐसे श्लोक (प्रक्षेप) जोड़ दिए गए, जो प्रामाणिक नहीं हैं। इस कारण उनमें काफी विरोधाभास दिखाई पड़ता है। ऋषि पाराशर के जन्म का जो कथानक है, वह विज्ञान के अनुसार वर्तमान में गलत सिद्ध होता है।

पाराशर जिस युग में हुए, उस युग में केवल नियोग की प्रथा थी। इस तरह यह प्रसंग केवल कल्पना प्रतीत होता है। इसी तरह राम के बारे में अनेक मिथ्या और भ्रामक बातें प्रचारित की गई हैं। वाल्मीकि रामायण में राम का पांव छू जाने से पत्थर की शिला से अहिल्या के प्रकट होने का वर्णन बताया जाता है। मूल वाल्मीकि रामायण में ऐसा प्रसंग कहीं नहीं मिलता है।

यह रचना बिल्कुल नई है। वाल्मीकि रामायण (बा.का. सर्ग- 49 श्लोक 11) में उल्लेख है कि श्रीराम व अन्य वहां जाकर, भाग्यशाली तप से प्रकाशमान प्रभाव वाली पूर्ण सुंदरी अहिल्या को देखकर प्रसन्न हुए। तब लक्ष्मण सहित राम ने उसके पांव पकड़ कर स्तुति की :

ददर्श च महाभागां तपसा द्योतित प्रभाव

लोकेरपि समागम्य दुर्निरीक्ष्यां सुरासुरै:।

हरपाल सिंह, डिफेंस कॉलोनी, दिल्ली
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