सुभाष
चंद्र
शर्मा
हमारे
देश में
अनेक
प्रसिद्ध
मंदिर हैं,
जहां बार-बार
जाने का मन
करता है। एक
ऐसा ही मंदिर
राजस्थान के
बीकानेर से
लगभग 30
किलोमीटर दूर
जोधपुर रोड पर
गांव देशनोक
की सीमा में
स्थित है। यह
है मां करणी
देवी का
विख्यात
मंदिर। यह भी
एक तीरथ धाम
है, लेकिन इसे
चूहे वाले
मंदिर के नाम
से भी देश और
दुनिया के लोग
जानते
हैं।
अनेक
श्रद्धालुओं
का मत है कि
करणी देवी
साक्षात मां
जगदम्बा की
अवतार थीं। अब
से लगभग साढ़े
छह सौ वर्ष
पूर्व जिस
स्थान पर यह
भव्य मंदिर है,
वहां एक गुफा
में रहकर मां
अपने इष्ट देव
की पूजा
अर्चना किया
करती थीं। यह
गुफा आज भी
मंदिर परिसर
में स्थित है।
मां के
ज्योर्तिलीन
होने पर उनकी
इच्छानुसार
उनकी मूर्ति
की इस गुफा में
स्थापना की
गई।
बताते
हैं कि मां
करणी के
आशीर्वाद से
ही बीकानेर और
जोधपुर राज्य
की स्थापना
हुई थी। मां के
अनुयायी केवल
राजस्थान में
ही नहीं, देशभर
में हैं, जो
समय-समय पर
यहां दर्शनों
के लिए आते
रहते हैं।
वर्ष 1999 में
बीकानेर में
आयोजित
श्रीमद्भागवत
सप्ताह के
दौरान दो दिन
वहां रहने का
अवसर मिला।
साथ कई
संगी-साथी और
भी थे। उसी
दौरान वहां
लोगों ने
बताया कि जब
यहां तक आए हो,
तो मां करणी
चूहे वाले
मंदिर के
दर्शन जरूर
करना। वहां
जाने वालों की
मनोकामना
पूरी होती है।
जब यह
जिज्ञासा
प्रकट की कि
इसे चूहे वाला
मंदिर क्यों
कहते हैं, तो
इस बारे में
उन्होंने
विस्तार से
बताया। इससे
मंदिर जाने की
उत्कंठा और
बढ़ गई। हम
अगले दिन
टैक्सी पकड़
कर मंदिर तक
पहुंच गए
।
संगमरमर
से बने मंदिर
की भव्यता
देखते ही बनती
है। मुख्य
दरवाजा पार कर
मंदिर के अंदर
पहुंचे। वहां
जैसे ही दूसरा
गेट पार किया,
तो चूहों की
धमाचौकड़ी
देख मन दंग रह
गया। चूहों की
बहुतायत का
अंदाजा इसी
बात से लगाया
जा सकता है कि
पैदल चलने के
लिए अपना अगला
कदम उठाकर
नहीं, बल्कि
जमीन पर
घसीटते हुए
आगे रखना होता
है। हमने वही
किया। लोग इसी
तरह कदमों को
घसीटते हुए
करणी मां की
मूर्ति के
सामने
पहुंचते हैं।
चूहे पूरे
मंदिर
प्रांगण में
मौजूद रहते
है। वे
श्रद्धालुओं
के शरीर पर
कूद-फांद करते
हैं, लेकिन
किसी को कोई
नुकसान नहीं
पहुंचाते।
चील, गिद्ध और
दूसरे
जानवरों से इन
चूहों की
रक्षा के लिए
मंदिर में
खुले स्थानों
पर बारीक जाली
लगी हुई है। इन
चूहों की
उपस्थिति की
वजह से ही श्री
करणी देवी का
यह मंदिर
चूहों वाले
मंदिर के नाम
से भी विख्यात
है।
ऐसी
मान्यता है कि
किसी
श्रद्धालु को
यदि यहां सफेद
चूहे के दर्शन
होते हैं, तो
इसे बहुत शुभ
माना जाता है।
सुबह पांच बजे
मंगला आरती और
सायं सात बजे
आरती के समय
चूहों का
जुलूस तो
देखने लायक
होता है।
करणी मां की
कथा एक
सामान्य
ग्रामीण
कन्या की कथा
है, लेकिन उनके
संबंध में
अनेक
चमत्कारी
घटनाएं भी
जुड़ी बताई
जाती हैं, जो
उनकी उम्र के
अलग-अलग पड़ाव
से संबंध रखती
हैं।
बताते
हैं कि संवत 1595
की चैत्र
शुक्ल नवमी
गुरुवार को
श्री करणी
ज्योर्तिलीन
हुईं। संवत 1595
की चैत्र
शुक्ला 14 से
यहां श्री
करणी माता जी
की सेवा पूजा
होती चली आ रही
है।
मंदिर
के मुख्य
द्वार पर
संगमरमर पर
नक्काशी को भी
विशेष रूप से
देखने के लिए
लोग यहां आते
हैं। चांदी के
किवाड़, सोने
के छत्र और
चूहों (काबा)
के प्रसाद के
लिए यहां रखी
चांदी की बड़ी
परात भी देखने
लायक
है।
मां
करणी मंदिर तक
पहुंचने के
लिए बीकानेर
से बस, जीप व
टैक्सियां
आसानी से मिल
जाती हैं।
बीकानेर-जोधपुर
रेल मार्ग पर
स्थित देशनोक
रेलवे स्टेशन
के पास ही है
यह मंदिर।
वर्ष में दो
बार
नवरात्रों पर
चैत्र व
आश्विन माह
में इस मंदिर
पर विशाल मेला
भी लगता है। तब
भारी संख्या
में लोग यहां
पहुंचकर
मनौतियां
मनाते हैं।
श्रद्धालुओं
के ठहरने के
लिए मंदिर के
पास
धर्मशालाएं
भी हैं।