प्रमुख
संवाददाता
नई
दिल्ली
:
सुप्रीम
कोर्ट ने कहा
है कि अग्रिम
जमानत के नाम
पर अभियुक्त
को खुली छूट
नहीं दी जा
सकती।
गैरजमानती
अपराध में
जांच एजेंसी
को अभियुक्त
की गिरफ्तारी
से रोकने से
आपराधिक
गतिविधियों
को ही बढ़ावा
मिलेगा।
जस्टिस
सी.के. ठक्कर
और जस्टिस डी.
के. जैन की
बेंच ने
राजस्थान हाई
कोर्ट के
अग्रिम जमानत
के एक आदेश पर
यह टिप्पणी
की। बेंच ने
कहा कि बिना
किसी शर्त के
अग्रिम जमानत
का आदेश देने
का मतलब
अभियुक्त को
अपराध करने का
न्योता देना
है। कानून के
राज पर आधारित
समाज में इस
तरह की इजाजत
नहीं दी जा
सकती।
सुप्रीम
कोर्ट ने
केन्द्र
सरकार द्वारा
हाई कोर्ट के
आदेश के खिलाफ
दायर अपील पर
यह फैसला
दिया। हाई
कोर्ट ने
कस्टम ड्यूटी
की चोरी के
अभियुक्त
पद्म नारायण
अग्रवाल को
अग्रिम जमानत
तो दी, साथ ही
यह आदेश भी
दिया कि अगर
अग्रवाल किसी
गैरजमानती
अपराध में
लिप्त है तो
उसे गिरफ्तार
करने से 10 दिन
पहले उसे
नोटिस दिया
जाए। अग्रिम
जमानत के इस
तरह के आदेश ने
सुप्रीम
कोर्ट को हैरत
में डाल दिया।
बेंच ने कहा कि
अभियुक्त को
अग्रिम जमानत
के तहत इस तरह
का खुला
संरक्षण
प्रदान करना
गैरकानूनी
है।
रेडीमेड
गारमेंट्स के
फर्जी
निर्यात
घोटाले के एक
मामले में
कस्टम विभाग
अग्रवाल से
पूछताछ करना
चाहता था।
विभाग का आरोप
था कि
अभियुक्त ने
सरकार को 75 लाख
रुपये का चूना
लगाया।
अभियुक्त की
अग्रिम जमानत
की अजीर् सेशन
कोर्ट से
खारिज हो गई।
हाई कोर्ट ने
कहा कि कस्टम
विभाग ने
अभियुक्त को
सिर्फ हाजिर
होने के लिए
कहा है, लिहाजा
उसे अग्रिम
जमानत दी जाती
है। सुप्रीम
कोर्ट ने
गिरफ्तारी से
पहले 10 दिन का
नोटिस दिए
जाने के हाई
कोर्ट के आदेश
को रद्द कर
दिया।