रमेश
चंद्र
कल
मंगलवार को
कार्तिक मास
के कृष्ण पक्ष
की अष्टमी है।
इसी दिन अहोई
अष्टमी मनाई
जाएगी। इस दिन
पुत्रवती
स्त्रियां
संतान व पति के
कल्याण के लिए
व्रत रखती
हैं। शाम को
तारे निकलने
पर दीवार पर
अहोई का चित्र
बनाकर उसकी
पूजा की जाती
है। बुधवार से
हेमंत ऋतु
प्रारंभ हो
जाएगी। इसी
दिन स्वामी
रामतीर्थ का
जन्मदिन भी
है। गुरुवार
को राष्ट्रीय
कार्तिक मास
शुरू होगा।
आचार्य
श्रीराम
शर्मा जयंती
भी मंगलवार को
मनाई जाएगी।
कौमुदी
महोत्सव का
आयोजन भी इसी
दिन किया
जाएगा।
शुक्रवार
को कार्तिक
कृष्ण पक्ष
में आने वाली
रमा अथवा रंभा
एकादशी है।
पद्म पुराण
में वर्णन है
कि इस दिन व्रत
रखने से
ब्रह्मा
हत्या जैसे
महापाप भी दूर
हो जाते हैं।
स्त्रियों के
लिए यह व्रत
सुख और
सौभाग्यप्रद
माना गया है।
शनिवार को
गोवत्स
द्वादशी है।
महिलाएं आज के
दिन व्रत रखती
हैं और सुबह या
गोधूलि में
गाय और बछड़े
की पूजा करती
हैं। इस दिन
व्रती एक ही
बार भोजन
ग्रहण करती
हैं।
रविवार
को धनतेरस है।
यह त्योहार
कार्तिक
महीने के
कृष्ण पक्ष की
त्रयोदशी को
मनाया जाता
है। माना जाता
है कि इसी दिन
भगवान
धन्वंतरि
समुद्र से
अमृत कलश लेकर
प्रकट हुए थे।
इसी कारण
वैद्य समाज
श्रद्धा व
हर्षोल्लास
के साथ भगवान
धन्वंतरि
जयंती मनाता
है। धन्वंतरि
को आयुर्वेद
के प्रवर्तक
तथा आरोग्य के
देवता के रूप
में माना जाता
है। धनतेरस के
दिन दीर्घायु
और स्वस्थ
जीवन की कामना
के लिए भगवान
धन्वंतरि की
पूजा की जाती
है। धनतेरस के
दिन ही मृत्यु
के देवता
यमराज की पूजा
की जाती है। यम
के नाम पर आटे
से निर्मित
दीप में तेल
डालकर घर के
मुख्य द्वार
पर रखा जाता
है। यम के नाम
का तर्पण भी
किया जाता
है।
धनतेरस
के दिन
लक्ष्मी का
आवास घर में
माना जाता है।
लोकाचार में
आज के दिन लोग
पुराने
बर्तनों के
बदले नए बर्तन
खरीदना शुभ
मानते हैं।
ऐसा विश्वास
किया जाता है
कि चांदी के
बर्तन खरीदने
से अधिक पुण्य
लाभ मिलता है।
ग्रामीणों
इलाकों में
धनतेरस पर
दीवाली के लिए
दीयों और रूई
की खरीदारी
करना शुभ माना
जाता है।
पुराण और
रामायण में
द्वितीय और
तृतीय
धन्वंतरियों
की वंशावली भी
दी गई है।
धन्वंतरि एक
उपाधि भी
है।
दीपावली
के दो दिन
पूर्व मनाए
जाने वाले इस
त्योहार का
धार्मिक,
सांस्कृतिक,
आध्यात्मिक
और वैज्ञानिक
महत्व भी है।
यह दीपावली
मनाने की
पूर्ण तैयारी
का पर्व है।
साफ-सफाई,
नवीनता और
अच्छी सेहत
होने पर ही
दीपावली का
पूरा आनंद
लिया जा सकता
है। लक्ष्मी
का आगमन वहीं
माना गया है,
जहां साफ-सफाई,
प्रकाश और
सुमति होती
है। त्रयोदशी
पर धन,
फूलमाला, सफेद
कपड़े और
गोले-पान से
भगवान
धन्वंतरि की
पूजा का विधान
है। बाजार से
नई वस्तु
खरीदकर भगवान
की तस्वीर के
सामने रखी
जाती हैं। फिर
आरती करते हुए
धन्वंतरि
देवता की
स्तुति की
जाती है।
धनतेरस
पर्व दीवाली
से जुड़ा हुआ
त्योहार है।
इसे दीवाली की
शुरुआत का
पहला दिन कह
सकते हैं।
धनाढ्य लोगों
में इसे काफी
खर्चीले
तरीके से
मनाया जाता
है। इस दिन
सोने-चांदी के
गहने खरीदने
को ज्यादा
महत्व दिया
गया है।
ज्यादातर लोग
घरेलू व
रोजमर्रा के
काम आने वाली
चीजों की
खरीदारी कर इस
त्योहार की
रस्म अदा करते
हैं। इस
त्योहार के
आते-आते वर्षा
काल समाप्त हो
जाता है, नवीन
योजनाओं की
शुरुआत, मकान व
कार खरीदना,
शादी आदि की
तिथि निश्चित
करना भी इस दिन
शुभ माना गया
है। इस मौके पर
बाजारों में
उत्सव का
माहौल रहता
है। मान्यता
है कि यह पर्व
धन की देवी
लक्ष्मी की
कृपा पाने के
लिए मनाया
जाता है। धन
शब्द का संबंध
द्रव्य से है,
इसलिए इस दिन
लक्ष्मी जी की
पूजा का
माहात्म्य
है।
इस दिन
लोग दरवाजे से
घर के अंदर तक
चावल के आटे
में रंग
मिलाकर
पदचिह्न
बनाते हैं,
जिसे लक्ष्मी
जी के प्रवेश
को आमंत्रित
करता माना गया
है। रंगोली
बनाकर भी इस
त्योहार को
रोचक बनाया
जाता है। शाम
को तेल का आटे
से निर्मित
दीया जलाया
जाता है, जो कि
सारी रात जलता
है। शाम के समय
श्रद्धालु
लक्ष्मी जी की
स्तुति में
भजन-कीर्तन
करते हैं।
अर्धरात्रि
में लक्ष्मी
जी की पूजा की
जाती है।
दक्षिण भारत
के कुछ
हिस्सों में
धनतेरस के दिन
किसान गाय की
पूजा करते
हैं। किसानों
के लिए गाय धन
की द्योतक
मानी गई है और
उसे लक्ष्मी
मानकर पूजते
हैं।
देश
कुछ भागों में
लोग जानवरों
को धो-नहला कर
उनका
श्रृंगार
करते हैं,
क्योंकि
पशुओं को धन
माना जाता है।
इस दिन तक घरों
और ऑफिसों की
अच्छी तरह
सफाई की जाती
है। इस पर्व पर
स्वच्छता का
खास ध्यान
दिया जाता है,
क्योंकि
वर्षा ऋतु में
कीड़े-मकोड़ों
और सीलन आदि
ज्यादा हो
जाती है।
धनतेरस पर कुछ
लोग व्रत भी
रखते हैं, और
शाम को एक बार
भोजन ग्रहण
करते हैं।