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दर्द से गुज़रे बिना आध्यात्मिक विकास नहीं : लिलेट दुबे 29 Oct 2008, 1006 hrs IST,टाइम्स ऑफ इंडिया
लिलेट
दुबे
मैं
मिलीजुली
मान्यताओं
वाले परिवार
से हूं। मेरे
पिता ने वेद
,
बाइबल
और कुरान सब पढ़
रखा है
,
वे
विज्ञानजन्य
तार्किकता
बरतते हैं तथा
किसी धर्म को
नहीं मानते।
इसके उलट मेरी
मां घोर
धार्मिक हैं।
वे नियमित रूप
से
गुरुद्वारा
जाती तथा
अक्सर मुझे भी
साथ ले जाती
रही हैं। उनकी
गुरुग्रंथ
साहिब में
अटूट श्रद्धा
है। इन भिन्न
मतों के बीच
बड़ी हुई मैं यह
महसूस करती
हूं कि कोई एक
उच्च शक्ति
है
,
कोई
चिनगारी है जो
हमें शासित
करती है। आप
इसे कोई भी नाम
दे सकते हैं।
वह ईश्वरीय
शक्ति
है।
मैं
मृत्यु के बाद
जीवन को मानती
हूं। यदि कोई
और जीवन नहीं
होता तो मेरे
लिए इस दुनिया
का कोई अर्थ
नहीं होता।
अगर हम इस
दुनिया में जी
रहे रासायनिक
अणु मात्र
होते तो यह
दुनिया एक
दुःस्वप्न
होती। तब तो इस
सबका कोई
नैतिक अर्थ या
जवाबदेही
नहीं होती। हम
सब जानवरों की
तरह जी रहे
होते।
मनुष्य
भौतिक या
मटीरियल की
जगह
आध्यात्मिक
ज्यादा है।
बाह्य सुख उसे
मन की गहन
शांति नहीं दे
सकते। खुशी
अंदर से आती
है। यह दुनिया
एक भ्रम है और
रोज़ बदल रही
है। हमें
वर्तमान में
जीना सीखना
चाहिए। यही
सबकुछ है। इस
पल का पूर्ण
आनंद
लो।
मुझे
भौतिक
उपलब्धियां
पाकर खुशी
होती है - चाहे
यह पैसा हो
,
अवार्ड
हो या
प्रसिद्धि
हो। अगर मैं
कुछ कर रही हूं
तो मुझे इसे
मगन होकर पूरा
करना है और
उसका आनंद
लेना है। अगर
मैं आनंद नहीं
उठाती तो कोई
भी बाह्य
उपलब्धि एक
पाखंड बनकर रह
जाएगी। दुख का
मूल कारण
अपेक्षा है।
आप दुनिया से
हमेशा कुछ
मांगते रहते
हैं और जब नहीं
पाते तो हताश
हो जाते हैं।
इसीलिए कोई
अपेक्षा मत
रखिए और जिस
काम में खुशी
मिलती है
,
वह करते
रहिए
,
आपको वो
आनंद मिल
जाएगा जिसके
आप हकदार
हैं।
मेरी
बेटी नेहा
ध्यान करती है
तथा मेरी बहन
मंत्रोच्चार।
मैं ऐसी किसी
विधि के खिलाफ
नहीं हूं पर
मैं उन्हें
नहीं अपनाती।
जब मैं हताश या
दुखी होती
हूं
,
मैं खुद
को हर तरह के
बोझ से मुक्त
कर लेती हूं और
सिर्फ उस एक पल
के बारे में
सोचती हूं।
अक्सर हम जिन
चीजों के कारण
बुरा महसूस कर
रहे होते हैं,
वे बहुत छोटी
होती हैं और हम
चिंता कर-करके
उन्हें बड़ा कर
लेते हैं।
दर्द एक सबक
होता है। जैसे
आप बुरे के
बिना अच्छे को
नहीं समझ
सकते
,
वैसे ही
दर्द से गुजरे
बिना आप
आध्यात्मिक
विकास नहीं पा
सकते।
ईश्वर
ने मुझे उससे
ज्यादा दिया
है जितना
मैंने चाहा।
मै उसकी
शुक्रगुजार
हूं। मैं जीवन
में हमेशा
सकारात्मक
रही
,
मैंने
हार नहीं मानी
तथा जीवन में
जितना हो सका,
सकारात्मक
ऊर्जा
बिखेरती रही
हूं।
अनुवाद
:
नीला
प्रसाद
इस
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