साइना
नेहवाल
मुझे
आध्यात्मिकता
का अर्थ मालूम
नहीं है और
इसीलिए उस तरह
मैं बता नहीं
सकती कि मैं
आध्यात्मिक
हूं या नहीं।
लेकिन ईश्वर
में मेरी दृढ़
आस्था है भले
ही मैं कोई
कर्मकांड
नहीं करती।
मैं पूजा की
जगहों पर जाने
के लिए कोई
विशेष
प्रयत्न नहीं
करती
,
न
ही
मंत्रोच्चार
या ध्यान के
द्वारा ईश्वर
के साथ
व्यक्तिगत
समय व्यतीत
करती हूं। मैं
यह भी नहीं
मानती कि लकी
चार्म मुझे
कहीं पहुंचा
सकते हैं।
विपरीत
समय में मैं
अपनी सारी
चिंताएं
व्यायाम के
द्वारा जला
लेती हूं।
मेरा मानना है
कि कठिन
परिश्रम और
अपने पेशे के
प्रति समर्पण
ही सबसे बड़े
गुण हैं और मैं
इसी दर्शन पर
जीती हूं। असल
में मेरे
माता-पिता भी
धार्मिक या
कर्मकांडी
नहीं हैं।
शायद इसीलिए
मैं इस तरह की
हूं।
उन्होंने
मुझे सिखाया
है कि जिंदगी
में सबसे बड़ा
गुण यह होना
चाहिए कि हम
किसी के प्रति
दुर्भावना
नहीं रखें और
मैं इसका कड़ाई
से पालन करती
हूं।
मेरे
माता-पिता
दोनों ही
राज्य स्तर के
बैडमिंटन
चैंपियन रहे
हैं। यानी कि
मेरा पूरा
परिवार ही खेल
में है। शायद
ही कोई
मध्यवर्गीय
परिवार अपनी
मासिक आय का
आधा हिस्सा
अपनी 8 साल की
बेटी की
ट्रेनिंग पर
खर्च करने की
सोच सकता है यह
जाने बिना कि
इस जुए का कोई
परिणाम
निकलेगा भी या
नहीं। लेकिन
मेरे
माता-पिता ने
यह किया और मैं
महसूस करती
हूं कि ईश्वर
ने उन्हें ऐसा
करने की तीव्र
इच्छाशक्ति
प्रदान की।
8
की उम्र में
मैं सुबह
जल्दी उठती थी
और 20 किलोमीटर
दूर स्टेडियम
जाती थी। दो
घंटे की
प्रैक्टिस के
बाद मेरे पिता
मुझे काम पर
जाते हुए
स्कूल छोड़
देते थे। मैं
अक्सर रास्ते
में ही सो जाती
थी जिस कारण
मेरी मां ने
अगले तीन
महीने हमारे
साथ जाना शुरू
किया।
मेरी
18 साल की
ज़िंदगी का
बहुत बड़ा
हिस्सा
प्रैक्टिस
करते और खेलते
गुज़रा है।
मेरा मानना है
कि एक्सरसाइज
चिंताएं दूर
करने और दिमाग
को शांत करने
का सबसे आसान
रास्ता है।
इससे अनवाइंड
करने और दूसरे
दिन के लिए
तरोताज़ा
होने में मदद
मिलती है।
अक्सर ऐसा
लगता है कि 18
बरस की उम्र
में मेरी जो भी
उपलब्धियां
हैं, वे ईश्वर
का मेरे प्रति
प्यार का फल
है
,
मैं
उसकी खास हूं।
अभी मैं वही कर
रही हूं जो
मुझे करना
चाहिए
–
आगे
के लिए लक्ष्य
निर्धारित
करना!
अपनी
कई शारीरिक
कमियों को दूर
करने के बाद अब
मुझे अपनी
मानसिक बनावट
पर ध्यान देना
है खासकर जब यह
अंतरराष्ट्रीय
जगत का मामला
हो। मैं महसूस
करती हूं कि
अक्सर खासी
बढ़त ले लेने के
बाद मैं
कभी-कभी उन पर
टिकने और काम
पूरा करने में
चूक जाती हूं।
आज भले ही मैं
ओलिम्पिक के
सिंगल्स
क्वॉर्टर
फाइनल में
पहुंचने वाली
पहली भारतीय
महिला
हूं
,
लेकिन मैं
इससे संतुष्ट
होनेवाली
नहीं। मेरा
लक्ष्य
ओलिंपिक का
गोल्ड मेडल ही
है।
अंग्रेज़ी
से
अनुवाद
:
नीला
प्रसाद