असफलता ने पढ़ाया विनय का पाठ : विवेक ओबेरॉय-धर्म और मैं-धर्म-दर्शन-Navbharat Times
 
असफलता ने पढ़ाया विनय का पाठ : विवेक ओबेरॉय
15 Oct 2008, 1509 hrs IST,टाइम्स ऑफ इंडिया  
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विवेक ओबेरॉय
यह कहना बहुत आसान है कि समय बुरा चल रहा है या कि भाग्य साथ नहीं है पर सच यह है कि हमारे जीवन की शक्ल हमारे कर्म ही तय करते हैं। जब मैं अपने जीवन के बुरे दौर में था , मैंने इससे बाहर निकलने के लिए सबकुछ किया। मेरे माता-पिता मेरे लिए इतने परेशान और उदास थे कि उन्हें देखकर बहुत दुख होता था। मैंने अपनी मां को मंदिर जाते , ज्योतिषियों से सलाह करते , मुझे अंगूठियां पहनाते , मेरे नाम में एक और ‘i’ लगाते तथा वो सबकुछ करते देखा जिससे मेरा भाग्य बदल जाए। मैं एक अच्छा बेटा बनना चाहता हूं , अपने माता पिता को खुद पर गर्व करते देखना चाहता हूं। इसीलिए मैं बदला। मैंने अपनी सभी परेशानियों - व्यावसायिक तथा व्यक्तिगत को - परीक्षा की तरह लिया। बजाय दूसरों को दोष देने के मैंने सीखना शुरू किया कि मेरी गलती कहां थी। और ईश्वर मेरे साथ है।
मैंने असफलताओं को बहुत करीब से देखा है। असल में असफलताएं मेरी सबसे अच्छी दोस्त थीं। ऐसा अतीत में कई बार हुआ कि मैं चोट और दुख से दूर भागना चाहता था। जिंदगी और मेरे काम ने मुझे ऐसे कोने पर लाकर खड़ा कर दिया था जहां से जाने को कोई जगह नहीं बचती। जब मैं अतल गहराइयों में पहुंच गया तो फिर मेरे जाने को सिर्फ ऊपर की दिशा ही बची। इसीलिए मैंने बुरे भाग्य को और बुरे समय को अपनी विपदा के लिए दोष देना बंद कर दिया तथा अपने भयों का सामना करना शुरू किया। मैंने खुद को कुछ कठिन सच बताए। यही वह समय था जब शूटआउट ऐट लोखंडवाला रिलीस हुई थी और लोगों ने मुझे फिर से स्वीकार करना शूरू कर दिया था। सफलता की उस शूरुआत पर मैंने विनय का पाठ सीखने की सोची। इसीलिए मैं उन सबों के पास गया जिन्हें मैंने चोट पहुंचाई थी और क्षमा मांगी। मैंने अपने पुलों की मरम्मत शुरू की , कार्मिक चक्र तोड़े और दुनिया के साथ शांति स्थापित की। मैं शूटिंग शुरू करने से पहले हमेशा प्रार्थना करता हूं। मैं ईश्वर से कहता हूं कि माध्यम तुम हो , मैं कला हूं। प्रार्थना मुझे केंद्रित रखती है।
माफी मांगना आसान नहीं है। इसके लिए आपको अपने साथ सचमुच ईमानदार होना पड़ता है और महसूसना पड़ता है कि विनय एक संपत्ति है। मैंने जब क्षमा मांगनी शुरू की तो मुझे लगा कि मैं हल्का हो रहा हूं। मेरे सीने से जैसे बोझ उतर गया। आज मैं ज्यादा खुश हूं। अब मैंने असली जिंदगी में ऐक्टिंग करनी छोड़ दी है। अपनी दूसरी पारी में मैं नई जमीन पर खड़ा हूं।
जब मैं चौबीस की उम्र में पैसे , ताकत , आदर और यश के संपर्क में आया तो बैलेंस ही खो बैठा। यह मेरा परिवार था - खासकर मेरी मां - जिसने मेरे होश बनाए रखे। उसने मुझे ध्यान दिलाया कि ईमानदारी , निष्ठा और काम की लगन ही वो ताकत हैं जिनके साथ मैं इंडस्ट्री में आया था। मैं सचमुच महसूस करता हूं कि ईश्वर ने मां का निर्माण किया क्योंकि वह खुद हर जगह हर समय उपस्थित नहीं रह सकता। आज मेरी मां कितनी खुष हैं। मैं फिर से अच्छे काम का भूखा हूं। मैं अच्छी तरह सोता हूं तथा निरंतर शांति और परम आनंद की अनुभूति महसूस करता हूं।
अंग्रेज़ी से अनुवाद : नीला प्रसाद
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