श्री
1008 चंद्र प्रभु
दिगंबर
जैन
अतिशय
क्षेत्र
देहरा-तिजारा
राजस्थान के
अलवर जिले में
स्थित है। यह
अतिशय
क्षेत्र
कहलाता है।
अतिशय का अर्थ
है सामान्य से
बहुत ज्यादा।
यानी ऐसा
क्षेत्र जहां
कुछ असाधारण
घटित हो या कोई
चमत्कार हो
जाए। यानी अगर
साधारण तौर पर
जो कुछ मांगा
जाए, उससे कहीं
ज्यादा मिल
जाए। इतना
मिले कि आप
सराबोर हो
जाएं। ऐसी ही
है तिजारा
क्षेत्र की
मान्यता।
तिजारा
का यह अतिशय
क्षेत्र या
कहें कि मंदिर
अलवर जिले से 52
किलोमीटर और
दिल्ली से 117
किलोमीटर की
दूरी पर स्थित
है। तिजारा
अतिशय
क्षेत्र में 24
तीर्थंकरों
में से 8वें
तीर्थंकर
श्री चंद्र
प्रभु भगवान
की आराधना की
जाती है। यहां
चंद्र प्रभु
भगवान की सफेद
रंग की अत्यंत
मनोहारी
संगमरमर की
मूर्ति
स्थापित है।
यह मूर्ति इस
क्षेत्र में
कराई गई खुदाई
के दौरान 16
अगस्त, 1956 को
निकली थी।
बताते हैं कि
तिजारा
क्षेत्र के एक
मशहूर वैद्य
बिहारी लाल की
पत्नी
सरस्वती देवी
ने तीन दिन का
उपवास रखा था।
तीसरे दिन
व्रत की रात को
उन्होंने
सपने में अपने
घर के निकट
स्थित एक
स्थान के बारे
में कुछ
अद्भुत दिखाई
दिया। अगली
सुबह जब उस
स्थान की
खुदाई कराई गई,
तो वहां चंद्र
प्रभु भगवान
की भव्य
मूर्ति
प्राप्त हुई।
खुदाई करने के
पश्चात जिस
समय मूर्ति
निकाली गई, तो
उसी वक्त
बारिश आरंभ हो
गई।
श्रद्धालु
जनों ने इसका
अर्थ यह
निकाला कि इस
प्रकार
प्रकृति ने ही
मूर्ति का
जलाभिषेक
करके उसे
पवित्र कर
दिया।
इस
घटना के कई
वर्ष बाद उसी
क्षेत्र से 29
मार्च, 1972 को
चंद्र प्रभु
भगवान की काले
रंग की
पद्मासन
मुद्रा में इस
अन्य मूर्ति
प्राप्त हुई।
यह मूर्ति
मंदिर के
दक्षिणी गेट
की खुदाई के
दौरान
निकली।
अतिशय
क्षेत्र में
स्थापित इस
मंदिर का
बाहरी स्वरूप
अत्यंत भव्य
है और इसी
आंतरिक सजावट
बहुत लुभावनी
है। मंदिर के
प्रांगण में
इतनी जगह है कि
एक ही बार में
यहां दो हजार
लोग आसानी से
मौजूद रह सकते
हैं। यहां एक
बड़ा हाल है।
इस हाल के
दोनों ओर
दीवारों पर
कांच का काम
किया गया है और
चित्रों के
माध्यम से उस
पर पौराणिक
कथा उकेरी गई
है।
ऐसी
मान्यता है कि
जो व्यक्ति इस
मूर्ति के
सामने सच्चे
मन से
प्रार्थना
करता है, उसकी
सभी इच्छाएं
पूरी होती
हैं। ऐसे लोग
जो किसी जादू
टोने से
प्रभावित
माने जाते हैं,
वे भी अपनी
समस्याओं के
निवारण के लिए
यहां आते
हैं।
मंदिर के
सामने एक
अत्यंत
आकर्षक स्तंभ
स्थापित है।
इसे मान स्तंभ
कहकर पुकारा
जाता है।
चूंकि स्तंभ
के ऊपर भगवान
की मूर्तियां
लगाई गई हैं और
जिनके दूर से
ही दर्शन हो
जाते हैं,
इसलिए इसे
मान-स्तंभ कहा
जाता है। यह भी
कहा जाता है कि
इस स्तंभ के
दर्शन मात्र
से ही व्यक्ति
का घमंड कम हो
जाता है।
सामान्य रीति
यह है कि मान
स्तंभ की चोटी
पर तीर्थंकर
भगवान की चार
मूर्तियां
स्थापित की
जाती
हैं।
तिजारा
में वर्ष में
दो बार विशेष
कार्यक्रमों
का आयोजन किया
जाता है। एक
बार फाल्गुन
सप्तमी को और
दूसरी बार
श्रावण शुक्ल
दशमी
को।
तिजारा
के अतिशय
क्षेत्र में
श्रद्धालुओं
के ठहरने के
लिए 300 कमरों की
धर्मशाला
बनाई गई है।
प्राचीन काल
में यह स्थान
देहरा नाम से
प्रसिद्ध था।
कालांतर में
यह स्थान
देहरा-तिजारा
और अब सिर्फ
तिजारा भी
कहलाता
है।
प्रस्तुति:
ऋचा जैन