58.
अल्लाह
तुम्हें आदेश
देता है कि
अमानतों को
उनके हकदारों
तक पहुंचा
दिया करो और जब
लोगों के बीच
फैसला करो, तो
न्याय पूर्वक
फैसला करो।
अल्लाह
तुम्हें
कितनी अच्छी
नसीहत करता
है।
निस्संदेह
अल्लाह सब कुछ
सुनता, देखता
है।
59. ऐ ईमान
लाने वालो,
अल्लाह की
आज्ञा का पालन
करो और रसूल का
कहना मानो और
उनका भी कहना
मानो, जो तुम
में अधिकारी
लोग हैं। फिर
यदि तुम्हारे
बीच किसी
मामले में
झगड़ा हो जाए
तो उसे तुम
अल्लाह और
रसूल की ओर
लौटाओ, यदि तुम
अल्लाह और
अंतिम दिन पर
ईमान रखते हो।
यही उत्तम है
और परिणाम की
दृष्टि से भी
अच्छा है।
60.
क्या तुमने उन
लोगों को नहीं
देखा जो दावा
तो यह करते हैं
कि वे उस चीज
पर ईमान रखते
हैं जो
तुम्हारी ओर
उतारी गई है और
जो तुम से पहले
उतारी गई है।
और चाहते हैं
कि अपना मामला
तागूत के पास
ले जाकर फैसला
कराएं, जबकि
उन्हें हुक्म
दिया गया है कि
वे उसका इनकार
करें? परंतु
शैतान तो
उन्हें
भटकाकर बहुत
दूर डाल देना
चाहता है।
61.
और जब उनसे कहा
जाता है कि आओ
उस चीज की ओर,
जो अल्लाह ने
उतारी है और आओ
रसूल की ओर, तो
तुम मुनाफको
(कपटाचारियों)
को देखते हो कि
वे तुम से
कतराकर रह
जाते हैं।
62.
फिर कैसी बात
होगी कि जब
उनकी अपनी ही
करतूतों के
कारण उन पर
बड़ी मुसीबत आ
पड़ेगी। फिर
वे तुम्हारे
पास अल्लाह की
कसमें खाते
हुए आते हैं कि
हम तो केवल
भलाई और बनाव
चाहते थे?
63.
ये वे लोग हैं,
जिनके दिलों
की बात अल्लाह
भलीभांति
जनता है तो तुम
उन्हें जाने
दो और उन्हें
समझाओ और उनसे
उनके विषय में
वह बात कहो, जो
प्रभावकारी
हो।
65. तो
तुम्हें
तुम्हारे रब
की कसम, ये
ईमानवाले
नहीं हो सकते,
जब तक कि अपने
आपस के झगड़ों
में ये तुम से
फैसला न
कराएं। फिर जो
फैसला तुम कर
दो, उस पर ये
अपने दिल में
कोई तंगी न
पाएं और पूरी
तरह मान
लें।
(
सूरा
अन-निसा की 177
आयतें मदीना
में उतरी
थीं)