विचारों के सूरज जलाने पड़ेंगे-कविता/शायरी-पाठक पन्ना-Navbharat Times
 
विचारों के सूरज जलाने पड़ेंगे
21 Nov 2008, 0934 hrs IST,नवभारतटाइम्स.कॉम  
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दीपक शर्मा, गाज़ियाबाद

चिरागों से अंधेरा मिटेगा कहां तक
विचारों के सूरज जलाने पड़ेंगे
बुझेगी नहीं जलन आंखों की ऐसे
कुछ झरने स्नेह के बहाने पड़ेंगे।

ठोकर वहीं कल लगेगी हमें भी
जिस पथ पर पाषाण हम छोड़ देंगे
कल हमको भी कांटे ही कांटे चुभेंगे
जो बागों से फूलों को हम तोड़ देंगे।

कब तक बहारें सजेंगी धरा पर
नए मौसम हमें ही सजाने पड़ेंगे
न सोचो हमें कुछ भी मिलता नहीं है
कुछ टूटे हुए तारों को जोड़ने पर।

मिलता है चैन इस बैचेन मन को
बंजर में नदियों का मुख मोड़ने पर
तरुओं से छाया मिलेगी कहां तक
अपनत्व के ठहराव बनाने पड़ेंगे।

बुझेगी नहीं जलन आंखों की ऐसे
कुछ झरने स्नेह के बहाने पड़ेंगे।
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