विकास
सिंह,
दिल्ली
vikas.mmc@gmail.com
कभी
सोचा था
और एक
कोशिश भी की
समय की रेत पर
कदमों के
निशान छोड़
जाएंगे
जब हम
यह दुनिया और
जहां छोड़
जाएंगे
लिख
सकेंगे तो
लिखेंगे हम
सारे हाल-ए-दिल
वरना दिल का
गुमान छोड़
जाएंगे।
कोशिश तो है
कि ला दूं बहार
गुलशन में
न
एक, बल्कि खिले
गुल हज़ार
गुलशन में
न
हुए गर
मुकम्मल हम
अपनी कोशिशों
में
वादा है
अपना एक तूफान
छोड़
जाएंगे।
जमाने
वालों, न घबराओ
मेरी हरकतों
से
हम तो
बेखौफ जिया
करते हैं
कौन
तैयार है साथ
जाने को
जाने
वाले तो
श्मशान छोड़
जाएंगे।