उज्ज्वल
चंद्र,
दिल्ली
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शबाना
आज़मी की
पहचान केवल
आज़मगढ़ या
मुस्लिम
समुदाय से
नहीं है। वह
देश की एक
जानी-मानी और
ज़िम्मेदार
हस्ती हैं।
पूरा देश उनकी
प्रतिभा का
कायल है। इन
सबके बावजूद
किसी
संप्रदाय
विशेष के पक्ष
में आनेवाली
उनकी
बयानबाज़ी
देशवासियों
के दिलों को
कचोटती हैं।
पिछले
महीने दिल्ली
के जामिया
मिलिया
विश्वविद्यालय
में आयोजित
समारोह में
आज़मगढ़ के
मुस्लिम
समुदाय को
निशाना बनाए
जाने पर आया
उनका बचकाना
बयान देश के
लिए चौकाने
वाला था। यह सच
है कि आज़मगढ़
की धरती ने कभी
अनेकों लाल
पैदा किए,
लेकिन क्या
अभी भी वही सच
बरकरार है?
क्या आज होने
वाले लगभग
तमाम आतंकी
घटनाओं के तार
आज़मगढ़ से
जुड़े हुए
नहीं हैं?
शबाना को इस
सच को मानने
में कोई
परेशानी नहीं
होनी चाहिए कि
इस्लामिक
आतंकवाद केवल
भारत में ही
नहीं दुनिया
के दूसरे तमाम
देशों में भी
अपने पांव
पसार चुका है।
इस्लामिक देश
पाकिस्तान और
सऊदी अरब भी इस
इस्लामिक
आतंकवाद से
परेशान हैं।
शबाना जी
कहती हैं कि
इस्लामिक
आतंकवाद
इस्लाम को
बदनाम करने की
साज़िश है और
यह मीडिया
द्वारा रची जा
रही है। यह मान
भी लें कि भारत
जैसे देश में
यह संभव है, तो
पाकिस्तान,
अफ़गानिस्तान,
इराक और अरब
जैसे देशों
में यह किनकी
साज़िश है?
क्या वहां भी
हिंदुत्ववादी
इंडियन
मीडिया का
प्रभुत्व है?
यह सच है कि
सारे मुसलमान
आतंकवादी
नहीं होते।
उनके दिलों
में भी देश
प्रेम की उतनी
ही भावना होती
है, जितनी अन्य
लोगों के
दिलों में और
यह भी सच है कि
लगभग 95
प्रतिशत
मुस्लिम
आतंकवादी
नहीं होते।
लेकिन, क्या
बाकी बचे 5
प्रतिशत
मुस्लिम
आतंकवादी
नहीं हैं? इस
तथ्य को हर कोई
मानता है।
सारे मुस्लिम
आतंकवादी
नहीं हैं,
लेकिन क्या इस
तथ्य को
झुठलाया जा
सकता है कि
सारे
आतंकवादी
मुस्लिम ही
होते
हैं?
शबाना
जी को देश
हिंदू-मुस्लिम
जैसे मुद्दों
से अलग रखता
आया है। उनकी
इज़्ज़त
हिंदू भी करते
हैं और हमेशा
ही करते
रहेंगे,
क्योंकि वह
देश कि छवि
हैं।
महाराष्ट्र
मुद्दे पर आया
शबाना का यह
बयान कि
'मीडिया इस
मुद्दे को
बेवजह तूल दे
रही है' क्या
किसी
दृष्टिकोण से
सही है? शबाना
को ऐसे गैर
ज़िम्मेदाराना
बयान से बचना
चाहिए,
क्योंकि इससे
देश की
भावनाओं को
ठेस पंहुचती
है।