कार्तिक
महीने के
शुक्ल पक्ष
की पंचमी व
षष्ठी को गंगा
और यमुना के तट
पर 'हमहूं
अरघिया देबै
हे छठि मैया... '
का लोक गीत
गाते
श्रद्धालुओं
की जो अपार
भीड़ एकत्र
होती है, वह एक
क्षेत्र
विशेष के
लोगों की अटल
आस्था का
परिचायक है।
छठ मुख्य
रूप से बिहार
और पूर्वी
उत्तर प्रदेश
में मनाया
जाता है।
बिहार में तो
इसे राजकीय
पर्व जैसा
दर्जा मिला
हुआ है। अब
कोलकाता,
दिल्ली और
मुंबई जैसे
महानगरों और
इनके उपनगरों
में भी
प्रवासी
बिहारी और
उत्तर प्रदेश
के लोग यह पर्व
बड़े पैमाने
पर मनाने लगे
हैं।
वैसे
तो प्रत्येक
पर्व में ही
स्वच्छता एवं
शुद्धता पर
विशेष ध्यान
दिया जाता है,
पर इस पर्व के
संबंध में ऐसी
धारणा है कि
किसी ने यदि
भूल से या
अनजाने में भी
कोई त्रुटि की
तो उसका कठिन
दंड भुगतना
होगा। इसलिए
पूरी सतर्कता
बरती जाती है
कि पूजा के
निमित्त लाए
गए फल- फूल
किसी भी कारण
अशुद्ध न होने
पाएं। उनमें
किसी प्रकार
की कोई कमी न
रह जाए।
इस
पर्व के नियम
बड़े कठोर
हैं। सबसे
कठोर अनुशासन
बिहार के
दरभंगा में
देखने को
मिलता है।
संभवत: इसीलिए
इसे छठ
व्रतियों का
सिद्धपीठ भी
कहा जाता है।
इस लोकपर्व का
संबंध बिहार
के उस क्षेत्र
से है, जो
इतिहास के
किसी दौर में
महान
सूर्योपासक
रहा है। यह
संबंध पूर्वी
बिहार अथवा
प्राचीन 'अंग'
प्रदेश से
जोड़ा जा सकता
है, जिसमें
भागलपुर,
मुंगेर, पटना,
गया, राजगृह,
चंपा नगरी और
मिथिला आदि
क्षेत्र आते
हैं।
ऐसा
समझा जाता है
कि इस पूजा के
दौरान
अर्घ्यदान के
लिए साधक जल
पूरित अंजलि
ले कर
सूर्याभिमुख
होकर जब जल को
भूमि पर
गिराता है, तब
सूर्य की
किरणें उस जल
धारा को पार
करते समय
प्रिज्म
प्रभाव से
अनेक प्रकार
की किरणों में
विखंडित हो
जाती हैं।
साधक के शरीर
पर ये किरणें
परा बैंगनी
किरणों जैसा
प्रभाव डालती
हैं, जिसका
उपचारी
प्रभाव होता
है।
छठ पर्व
हिंदी महीने
के कार्तिक
मास के छठे दिन
मनाया जाता
है। यह कुल चार
दिन का पर्व
है। प्रथम दिन
व्रती गंगा
स्नान करके
गंगाजल घर
लाते हैं।
दूसरे दिन, दिन
भर उपवास रहकर
रात में उपवास
तोड़ देते
हैं। फिर
तीसरे दिन
व्रत रहकर
पूरे दिन पूजा
के लिए
सामग्री
तैयार करते
हैं। इस
सामग्री में
कम से कम पांच
किस्म के फलों
का होना जरूरी
होता है।
केले का घौद
(कांधी) व
ठेकुआ (आटा व
चीनी से बना
हुआ मीठा
पकवान) दौरी या
टोकरी में
सजाकर सूप
(बेंत या पीतल
का) में जलता
हुआ दीया अपने
सामने रखकर
व्रतधारी
बैठते हैं और
महिलाएं छठ का
गीत गाती हैं।
तीसरे दिन
ही शाम को
जलाशयों या
गंगा में खड़े
रहकर व्रती
सूर्यदेव की
उपासना करते
हैं और उन्हें
अर्घ्य देते
हैं। अगले दिन
तड़के पुन: तट
पर पहुंचकर
पानी में खड़े
रहकर
सूर्योदय का
इंतजार करते
हैं।
सूर्योदय
होते ही सूर्य
दर्शन के साथ
उनका
अनुष्ठान
पूरा हो जाता
है। पूरे
चौबीस घंटे
व्रतधारियों
का निर्जला
बीतता है।
इस व्रत में
पहले दिन खरना
होता है। पूरे
दिन उपवास
रखकर व्रती
शाम को गुड़ की
खीर और रोटी का
प्रसाद ग्रहण
करते हैं। साथ
ही लौकी की
सब्जी खाने की
भी परंपरा है।
कहा जाता है कि
गुड़ की खीर
खाने से जीवन
और काया में
सुख-समृद्धि
के अंश जुड़
जाते हैं। इस
प्रसाद को लोग
मांगकर भी
प्राप्त करते
हैं अथवा
व्रती अपने
आसपास के घरों
में स्वयं
बांटने के लिए
जाते हैं, ताकि
जीवन के सुख की
मिठास समाज
में भी फैले।
इस पर्व के
संबंध में कई
कहानियां
प्रचलित हैं।
एक कथा यह है
कि लंका विजय
के बाद जब
भगवान राम
अयोध्या लौटे
तो दीपावली
मनाई गई। जब
राम का
राज्याभिषेक
हुआ, तो राम और
सीता ने सूर्य
षष्ठी के दिन
तेजस्वी
पुत्र की
प्राप्ति के
लिए सूर्य की
उपासना की।
इसके अलावा एक
कथा यह भी है
कि सूर्य
षष्ठी को ही
गायत्री माता
का जन्म हुआ
था। इसी दिन
ऋषि
विश्वामित्र
के मुख से
गायत्री
मंत्र फूटा
था। पुत्र की
प्राप्ति के
लिए गायत्री
माता की भी
उपासना की
जाती है।
एक
प्रसंग यह भी
है कि अपना
राजपाट खो
चुके जंगलों
में भटकते
पांडवों की
दुर्दशा से
व्यथित
दौपद्री ने
सूर्यदेव की
आराधना की
थी।
श्रीराम
साव