अमरजीत
सिंह,
दिल्ली
mamabhanjacom@yahoo.co.in
भविष्य
में फायदे
को
सोचकर एक आदमी
ने एक दिन भैंस
खरीदी। सब कुछ
ठीक-ठाक चल रहा
था और फायदे भी
खूब हो रहे थे।
गर्मी का मौसम
आया तो भैंस ने
दूध देना कम कर
दिया। आदमी ने
देखा कि अब
भैंस जितना
चारा खा रही
है, उससे कम या
उतना ही दूध दे
रही है। फायदा
कुछ भी नहीं हो
रहा है। उस
आदमी ने बिना
कुछ सोचे-समझे
बेचारी भैंस
का चारा कम कर
दिया।
इधर
चारा कम करने
की देर थी, कि
उधर भैंस ने
दूध देना और कम
कर दिया। फिर
क्या था, उस
आदमी ने
गुस्से में
आकर चारा और कम
कर दिया। आदमी
चारा कम करता
गया और भैंस
दूध देना कम
करती गई। खाने
की लापरवाही
से भैंस बीमार
रहने लगी। अब
उस आदमी का
गुस्सा
सातवें आसमान
पर चढ़ गया और
भैंस का चारा
साफ बंद कर
दिया।
बिना
खाए-पीए कोई
ज़िंदा रह
सकता है
भला
?
चारा बंद
होने से भैंस
आखिर मर गई। उस
आदमी ने कहा,
'
मुझे
पता था कि भैंस
ज्यादा समय तक
ज़िंदा नहीं
रह पाएगी,
इसलिए मैंने
इसका चारा बंद
कर
दिया।
'
इस कहानी से
मैं आजकल चल
रही मंदी के
दौर में उन
कंपनियों को
यह बताना
चाहता हूं कि
मंदी में
कंपनी के
कर्मचारियों
का चारा बंद न
करें।