हरेद्र
सिंह रावत,
अमेरिका
harendrarawat2003@gmail.com
यह उन दिनों
की बात है, जब
मैंने 10वीं की
परीक्षा पास
कर ली थी और
नौकरी की तलाश
कर
रहा था।
पापा नहीं थे!
परिवार में
मेरी मां, बड़ा
भाई, एक छोटा
भाई और एक सबसे
छोटी बहन थी।
बड़े भाई
पढ़े-लिखे
नहीं थे, इसलिए
छह महीने
खेती-बाड़ी का
काम करते थे और
छह महीने
के
लिए
जंगलों में
जाकर किसी
ठेकेदार की
नौकरी करते
थे। पहाड़ का
इलाक़ा,
सीढ़ीनुमा
खेत,
सिंचाई
का कोई ज़रिया
नहीं था! खेतों
में जितनी
मेहनत की जाती
थी, उतनी उपज
नहीं
होती थी!
बड़े भाई जो
कमाते थे, उससे
घर का खर्च
बड़ी मुश्किल
से चलता था !
मेरी पढ़ाई
मामा कोट में
हुई थी। पूरे
परिवार की
नज़र मेरी तरफ
लगी थी कि मैं
10वीं करते
ही
नौकरी
शुरू कर दूँ और
परिवार की
आर्थिक तंगी
को दूर करने
में बड़े भाई
की मदद करूं!
इसलिए मैं
नौकरी की तलाश
में कभी पौड़ी
गढ़वाल के
बड़े-बड़े
कस्बों के
चक्कर लगाया
करता था, जैसे
कोटद्वारा,
लैंसीडौन,
पौड़ी आदि।
जनवरी का
महीना था,
सर्दी पूरे
यौवन पर थी।
मुझे
लैंसीडौन
नेवी में
भर्ती के लिए
बुलावा आया
हुआ था। पहनने
के लिए गर्म
कपड़े नहीं थे!
एक पैंट और एक
हाफ़ बांह की
बुशर्ट पहन कर
मैं सुबह-सुबह
घर से चल पड़ा!
घाटी का
रास्ता! उस समय
आवागमन के
साधन नहीं थे !
पैदल ही पैदल
पहाड़ियों का
उतार-चढ़ाव
नापना पड़ता
था। काफ़ी तेज
चलने के
बावजूद
रास्ते
में ही रात पड़
गई! रात एक
गांव में
बिताई! एक
अच्छा
सांस्कारिक
परिवार मिल
गया था,
उन्होंने
अच्छी
खातिरदारी की!
अगले दिन सूरज
निकलने से
पहले ही मैं
चल पड़ा अपनी
मंज़िल की तरफ!
सुबह के नौ बजे
मैं लैंसीडौन
पहुँच गया था! 10
बजे
भर्ती
कार्यालय
खुला और भर्ती
करने वाला
स्टाफ
ग्राउंड में आ
गया! भाग-दौड़
हुई, नाप तौल
हुआ, इस तरह
शाम हो गई ! जो
लोग सलेक्ट हो
गए थे, उन्हें
वहां अपने
बंदोबस्त से
रुकने
का
आदेश था और
मैं उनमें से
एक था ! अगले
दिन सुबह हम
लोग फिर भर्ती
कार्यालय
पहुँचे !
कुछ
और फॉरमैलिटी
करते-करते दिन
के दो बज गए थे!
सवा दो बजे के
करीब हमें एक
प्रश्नावली
दी गई, जिसका
समय था तीन
घंटे का! खैर,
पूरे पांच बजे
मैने उत्तर
पुस्तिका
पूरी
करके
जमा कर दी!
अंधेरा हो
चुका था!
लैन्सीडौन से
बाहर जाने का
समय नहीं था!
होटल में
ठहरने के लिए
जेब में पैसे
नहीं थे! मैं
आया था दो दिन
का हिसाब लेकर,
अगर भर्ती हो
गया, तो ठीक
नहीं तो दूसरे
दिन घर पहुंच
ही जाउंगा।
कड़ाके की
सर्दी,
सर्दीली
हवाओं ने हालत
खराब कर दी थी,
उपर से मुझे
ज़ोर का जुकाम
लगा हुआ था
!
लैंसीडौन को
आज भी स्थानीय
भाषा में
कालों का डंडा
कहा जाता है !
सालों पहले
जब पौड़ी
गढ़वाल
ब्रिटिश
साम्राज्य के
अंतर्गत
कुमाऊं
कमीश्नरी का
एक अंग था, उस
समय
लैंसीडौन
नाम का एक
अंग्रेज भारत
का गवर्नर
जनरल बनकर आया
था, उसी ने
कालो डंडा का
नाम बदल कर
लैंसीडौन रखा
था और साथ ही
इसको गढ़वाल
राइफ़ल्स का
रेजीमेंटल
सेंटर
बना
दिया था!
उसके बाद यहां
तहसील आई और भी
बहुत से
कार्यालय
यहाँ खुले और
आज यह
स्थान
भारत के नक्शे
में अपना
स्थान बना
चुका है !
मुझे
एक सज्जन ने एक
होटल का पता
दिया, यह कहते
हुए कि होटल का
मालिक एक
नेक
दिल इंसान है,
कम से कम वे एक
रात को सोने के
लिए बिस्तर तो
दे ही देंगे।
मैं डरते-डरते
उस होटल में
पहुंचा, जाकर
उनसे अपनी
आपबीती बताई
और प्रार्थना
की कि वे मुझे
रात सोने के
लिए अपने होटल
में एक खाट, एक
दरी और एक कंबल
का प्रबन्ध कर
दें। उन्होने
मुझसे कहा कि
उनके होटल में
केवल वही लोग
बिस्तर के
हकदार हैं, जो
उनके होटल में
खाना खाएंगे,
जो खाना नहीं
खाएंगे, उनको
होटल में रहने
की इजाज़त
नहीं है !
मैंने उनसे
कहा कि मेरे
पास खाना
खाने के लिए
पैसे नहीं
हैं। उन्होने
पूछा, "बताओ
कितने पैसे
हैं।" मैने जेब
से 75 पैसे
निकाल कर उनके
सामने रख दिए।
वह मेरी
जिंदगी का
पहला अवसर था,
जब मुझे अपनी
ग़रीबी
का
अहसास हुआ!
मेरी आँखों से
आँसू निकल
पड़े! सचमुच
में वे एक नेक
और रहम
दिल
इंसान थे,
उन्होने वे 75
पैसे अपनी जेब
में रखे। होटल
के
कर्मचारियों
को मुझे अच्छे
से
अच्छा
खाना
खिलाने के लिए
कहा ! साथ ही एक
अलग कमरा साफ
सुथरे गद्दा
रजाई के साथ
सोने के लिए
मुझे दिया गया!
आज भी जब मुझे
वह दिन याद आता
है, वह नेक दिल
इंसान
मुस्कराते
हुए अभी भी
मेरी नज़रों
के आगे आ जाते
हैं और उन्हें
नमन करने को जी
चाहता है !