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बदलाव की बात
6 Nov 2008, 2359 hrs IST,नवभारत टाइम्स  
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बदलाव प्रकृति का गुण है। प्रकृति में रोज कुछ न कुछ नया घटित हो रहा है। इसी तरह समाज में भी बहुत कुछ बदल रहा होता है। लेकिन बदलाव का कोई एक रंग नहीं है, न ही कोई तरीका। इसे मापने या व्यक्त करने का कोई एक निश्चित पैमाना भी नहीं है। जो जिस तरह से महसूस करता है, बदलाव उसके लिए वैसा ही होता है।

संभव है जीवन से निराश व्यक्ति को अपने आसपास सब कुछ जड़ और स्थिर दिखाई दे लेकिन उत्साह और उमंग से भरा शख्स छोटे से छोटे परिवर्तन को भी महसूस करता है और उसे गंभीरता से लेता है। सालों से उपेक्षित व्यक्ति को अपने जीवन में मामूली बदलाव भी बहुत बड़ा नज़र आ सकता है लेकिन मुमकिन है प्रतिष्ठित या साधन-संपन्न व्यक्ति छोटे-मोटे परिवर्तनों को गंभीरता से न ले।

बदलाव को महसूस करने में अपना स्वभाव, अपनी मर्जी, अपनी अपेक्षाएं बेहद महत्वपूर्ण हैं। महत्वपूर्ण यह भी है कि हम बदलाव को कहां से देख रहे हैं। समाज से कटे हुए लोगों को बहुत से बदलाव नज़र ही नहीं आते जबकि आम जनजीवन के करीब रहने वाला तबका हर बदलाव को जल्दी भांप लेता है।

संजय कुंदन
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