खाली ढांचे खड़े करना बेमानी-फोकस-विचार मंच-Navbharat Times
 
खाली ढांचे खड़े करना बेमानी
8 Nov 2008, 2359 hrs IST,नवभारत टाइम्स  
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दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल विजय कपूर मानते हैं कि अगर दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाना है तो सिर्फ ढांचे खड़े करने से काम नहीं चलेगा। लोगों में सुरक्षा की भावना हो, शिष्टाचार हो, महिलाओं से बर्ताव का सलीका हो, पुलिस का सम्मान हो और हां, पुलिस तंत्र में सुधार भी हो... तभी दिल्ली एक मिसाल कायम कर पाएगी।

कपूर अवैध कॉलोनियों को रेग्युलर करने के पक्ष में हैं, लेकिन डीडीए द्वारा मकान देने की ताजा मुहिम पर उनका कहना है कि डीडीए के साढ़े बारह गज के मकान छलावा हैं, बकरी भी नहीं रह सकती इनमें! नरेश तनेजा से खास बातचीत में कपूर काफी कुछ बोले :



दिल्ली के बारे में आपकी सोच, आपका विजन?

दिल्ली को भविष्य में एक महानगर का आदर्श पेश करना है कि महानगर कैसा होना चाहिए? उसकी ढांचागत सुविधाएं कैसी हों? लोगों में आपसी मेलजोल का तरीका कैसा हो? दिल्ली का सांस्कृतिक स्तर कैसा हो? आसपास से ही नहीं, देश के दूरदराज के इलाकों और गांवों से भी लोग दिल्ली आते हैं। उन्हें भी सपोर्ट करना है क्योंकि उनका भी दिल्ली के विकास में योगदान है। दिल्ली एक तरह से पूरे भारत की छवि पेश करती है। यहां सब क्षेत्रों और भाषाओं के लोग मौजूद हैं और क्षेत्रवाद के लिए यहां कोई जगह नहीं है। दिल्ली उनकी है, जो कई बरसों से यहां आते रहे हैं।

मूलभूत सुविधाओं में दूसरे विश्वस्तरीय शहरों के मुकाबले दिल्ली को कहां पाते हैं?

बाकी देश से अलग-थलग कर विकसित मुल्कों के शहरों के साथ दिल्ली की तुलना की ही नहीं जा सकती। जैसे-जैसे देश की तरक्की होगी, दिल्ली का भी विकास होता जाएगा।

दिल्ली में बिजली-पानी की हालत कैसे सुधरेगी?

ऐसा कोई जादुई फॉर्म्युला तो किसी के पास नहीं हो सकता, पर सुधार तो होना ही चाहिए। बिजली की सप्लाई बढ़ाई जानी चाहिए और डिस्ट्रिब्यूशन ज्यादा तर्कसंगत व कुशल होना चाहिए। बिजली का निजीकरण तो कर दिया गया लेकिन जब तक उसमें कॉम्पिटिशन न लाया जाए, तो सुधार होना नामुमकिन है। प्रतिस्पर्धा तभी हो सकती है, जब सप्लाई डिमांड से ज्यादा हो।

इलेक्ट्रिसिटी एक्ट में प्रतिस्पर्धा का प्रावधान भी है। यानी बिजली कानून कहता है कि एक ही एरिया में एक से ज्यादा कंपनियों को लाइसेंस दिया जा सकता है। जरूरी नहीं है कि ये कंपनियां समानांतर लाइन डालें। कोई कंपनी चाहे तो शुल्क देकर दूसरी कंपनी की लाइन इस्तेमाल कर सकती है। इसी तरह पानी की उपलब्धता बढ़ाई जानी चाहिए।

पहाड़ी इलाकों से पानी जमा करके दिल्ली लाया जाना बहुत जरूरी हो गया है। दिल्ली में न सिर्फ कुल आपूर्ति एक हजार मिलियन गैलन प्रतिदिन (एमजीडी) करने की कोशिश करनी चाहिए, बल्कि उसके डिस्ट्रिब्यूशन को भी बेहतर बनाया जाना चाहिए। पीने के पानी को मूलभूत अधिकार बना देना चाहिए, जिसका मतलब है कि सभी लोगों को एक निश्चित मात्रा में पीने का पानी मुफ्त उपलब्ध हो।

उस निश्चित मात्रा से ज्यादा लेने पर शुल्क लिए जाएं। पानी की क्वॉलिटी भी अच्छी होनी चाहिए।

सड़कों की हालत से खुश हैं?

खुश नहीं हूं। नए मास्टरप्लान के अनुसार शहरीकरण का जो विस्तार हो रहा है, उसे पूरी दिल्ली के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। एक सड़क या एक फ्लाईओवर ठीक कर देने से कुछ नहीं होता क्योंकि इससे अगर वहां समस्या सुलझेगी तो कुछ आगे जाकर बात फिर बिगड़ जाएगी। शहर के नए विस्तार को नजरअंदाज करके सड़कों को सुधार पाना मुमकिन नहीं होगा। सार्वजनिक परिवहन को तो प्रमुखता देनी ही होगी।

बढ़ रहे ट्रैफिक व ट्रैफिक मिसमैनिजमंट पर आप क्या कहेंगे?

ट्रैफिक बढ़ा है, इसलिए इसमें मिसमैनिजमंट भी हो सकता है। सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना ही पड़ेगा। इतनी ज्यादा प्राइवेट गाड़ियां यह शहर सहन नहीं कर सकता।

मिक्स्ड लैंड यूज से आस-पास के लोगों का जीना दुश्वार हो जाएगा?

लैंड यूज में लचीलापन होना चाहिए, पर उसका मतलब यह नहीं कि दिल्ली में हर जगह इंडस्ट्रीज लग जाएं या दुकानें खुल जाएं। किसी भी मास्टरप्लान में भविष्य में उत्पन्न हो सकने वाली नई गतिविधियों या धंधों का अंदाज लगाकर सभी बातें शामिल कर पाना संभव नहीं होता। 1961 में बने मास्टरप्लान में आज की सभी योजनाओं को लिख पाना संभव नहीं था।

किसने सोचा था कि दिल्ली-गुड़गांव रोड जैसी जगह पर फैशन डिजाइनरों का भी मार्केट हो सकता है। पहले से तय लैंड यूज अगर बदलते वक्त के साथ कदमताल नहीं करेगा तो कामयाब नहीं हो सकता। दिल्ली में वेयरहाउसेज की जरूरत है। बहुत से ऐसे प्रफेशन हो सकते हैं, जो नए मास्टरप्लान को बनाते वक्त मौजूद नहीं हैं, लेकिन बाद में कभी सामने आएंगे। समय के साथ नए प्रफेशन सामने आते हैं, जिनके साथ जुड़ी कई दूसरी गतिविधियां भी शुरू हो जाती हैं।

ऐसे में बाजार के बदलते रूपों को ध्यान रखकर मास्टरप्लान में लचीलापन बरतना चाहिए। मैं इलाके में रहने वालों के हालात को नजरअंदाज करने की बात नहीं कह रहा हूं लेकिन स्थिति के अनुसार सोचना जरूरी है। जैसे नई सड़क के कागज व्यापारियों को कहा गया था कि वे भले ही अपनी दुकान यहां रखें लेकिन गोदाम बाहरी एरिया में ले जाएं ताकि इस एरिया में भीड़भाड़ न बढ़े।

दिल्ली में कानून और व्यवस्था की हालत, खासकर रात में महिलाओं के हिसाब से?

सुरक्षा की स्थिति में सुधार किसी भी शहर के लिए जरूरी है। अगर हमें एक महानगर का आदर्श पेश करना है तो आपसी शिष्टाचार बर्ताव में सुधार होना चाहिए। लोगों के मन में सुरक्षा का भाव मजबूत होना चाहिए। पुलिस तंत्र को बेहतर बनाना होगा, जिसके लिए ट्रेनिंग और तकनीकी क्षमताओं को बढ़ाना होगा। पुलिस ढांचे का पुनर्गठन जरूरी है। पुलिसकर्मियों के स्तर को ऊंचा किया जाना जरूरी है। उसकी क्षमताओं और लोगों से बर्ताव करने के तरीके में भी सुधार होना चाहिए। इसके लिए लगातार कोशिशें होती रहनी चाहिए।

अभी दिल्ली किस तरफ जा रही है?

किसी तरह की भविष्यवाणी न इंसान के बारे में की जा सकती है, न स्थान के बारे में। सब कुछ कोशिशों पर निर्भर करता है। अगर अच्छी कोशिशें होंगी तो दिल्ली तरक्की की तरफ जाएगी, वरना अव्यवस्था के दलदल में धंसती चली जाएगी। दिल्ली का बहुआयामी विकास होना चाहिए, जिसमें सभी के लिए जगह हो। सिर्फ ढांचों से ही बात नहीं बनती, न ही इनके आधार पर किसी शहर की क्वॉलिटी आंकी जा सकती है।

क्या अवैध कब्जों व अवैध कॉलोनियों को मंजूर किया जाए?

बिल्कुल होना चाहिए, बल्कि यह काम बहुत पहले ही कर देना चाहिए था। इस बारे में लचीला रवैया अपनाया जाना चाहिए। ऐसी कॉलोनियों को सिर्फ रेग्युलर करना और ढांचागत सुविधाएं जुटाना ही काफी नहीं है। वहां के लोगों को मालिकाना हक भी दिया जाना चाहिए। इस बाबत उन्हें कागजात दिए जाने चाहिए, जिनके आधार पर वे बैंकों से पैसा उधार ले सकें। ऐसी कॉलोनियों के नक्शे भी पास होने चाहिए।

क्या बाहर से आए लोगों के दिल्ली में बसने पर रोक न लगा देनी चाहिए?

अभी 1,500 वर्ग किलोमीटर दिल्ली में से तकरीबन 700 वर्ग किलोमीटर एरिया ग्रामीण है, जोकि विकास के लिए उपलब्ध है।

हर जगह विकास? कुछ जगह तो सांस लेने के लिए खुली रखनी होगी।

बेशक यह सही है। मैं कंक्रीट के जंगल खड़े करने की बात नहीं कह रहा। नए मास्टरप्लान में तकरीबन 50 फीसदी ओपन स्पेस है।

लेकिन कोई लिमिट तो होनी ही चाहिए?

इस तरह की सीलिंग का कोई मतलब नहीं है क्योंकि कहीं भी आने-जाने और बसने का मौलिक अधिकार संविधान में दिया गया है। क्या आप संविधान के प्रावधान को नजरअंदाज करना चाहते हैं? निम्न व मध्य आय वर्ग के मकानों के लिए क्यों कुछ नहीं किया गया? डीडीए ने क्यों पांच-छह साल बाद ये छह हजार फ्लैट निकाले हैं? दिल्ली में कम-से-कम दस लाख ड्राइवर होंगे।

हमारे घरों में मदद करने के लिए कुक, स्वीपर, सिक्युरिटी गार्ड या मेड आदि की जरूरत पड़ती है। क्यों इनके रहने के बारे में नहीं सोचा गया? और ये साढ़े बारह गज के मकान, जिनमें बकरी भी नहीं रह सकती, छलावा भर हैं। कम-से-कम इंसानी गरिमा का मान तो रखा जाना चाहिए। एक तरफ आप वर्ल्ड क्लास शहर की बात करते हैं, दूसरी तरफ जीते-जागते इंसानों को माचिस के बक्सों में ढकने की कोशिश करते हैं। लोगों के जीवन स्तर को सुधारे बिना कुछ नहीं हो सकता।

दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा न मिलना भी समस्याओं की जड़ है?

दिल्ली के प्रशासन को चलाने के लिए शक्तियों को जगह-जगह बांटा जाना ठीक नहीं है। एनडीए के शासनकाल में संसद में बिल पेश किया गया था कि एनडीएमसी एरिया को छोड़कर बाकी को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए। पता नहीं, वह मुद्दा कहां छूट गया?
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