दिल्ली
को जब
भी
वर्ल्ड क्लास
सिटी बने का
जिक्र होता है
तो बिजली-पानी,
ट्रैफिक,
अपराध,
प्रदूषण...
जैसी कई
समस्याओं की
बात भी जरूर
उठती है। ऐसे
में वे कौन से
तरीके हो सकते
हैं, जिन्हें
अपनाकर
दिल्ली को और
बेहतर शहर
बनाया जा सकता
है। दुनिया के
ऐसे कई शहर
हैं,
जिन्होंने
अपनी
समस्याओं के
निबटारे के
लिए खास तरीके
अपनाए और उनकी
कोशिशें रंग
भी लाईं। इन
फॉर्म्युलों
को अपनाकर
काफी हद तक
दिल्ली का
रेकॉर्ड भी
बेहतर किया जा
सकता
है।
पलूशन
पर कंट्रोल :
सबसे पहले बात
पड़ोसी मुल्क
चीन की
राजधानी
पेइचिंग की।
यहां एक
केमिकल
इंडस्ट्री
रोड है।
खासियत यह है
कि एक भी
केमिकल
इंडस्ट्री इस
सड़क पर नहीं
है। वजह, यहां
से
फैक्ट्रियों
को बाहर भेज
दिया गया है।
यह कदम उस
महंगे और
विशाल
क्लिनअप
प्रोग्राम का
हिस्सा था, जो
ओलिंपिक
गेम्स से पहले
इस शहर में
चालू किया
गया। इसके तहत
200
फैक्ट्रियों
को बाहर भेजा
गया। दर्जनों
सीमेंट, चूने व
ईट के प्लांट
बंद कर दिए गए।
इसके अलावा
कोयले से चलने
वाले करीब 60
हजार बॉयलर्स
को नेचरल गैस
जैसे एनर्जी
सोर्स से
चलाने के
इंतजाम किए
गए।
नैशनल
स्टेडियम में
रेनवॉटर
रिसाइकलिंग
प्लांट लगाया
तो सॉफ्टबॉल
फील्ड में
सोलर पावर
लाइट लगाईं
गईं। इसी तरह
गैस टर्बाइन
जेनरेटर और
विंड टर्बाइन
जेनरेटर के
इस्तेमाल पर
जोर दिया गया।
इन तमाम
कोशिशों का
असर यह रहा कि
पेइचिंग में
प्रदूषण काफी
कम हो गया और
एक बेहतर
साफ-सुथरे
इन्वाइरन्मंट
में लोगों ने
गेम्स का
लुत्फ उठाया।
बदहाली
में भी बेहतर :
इसी तरह
थाइलैंड की
राजधानी
बैंकॉक में भी
कार और बसों को
पेट्रोल-डीजल
के बजाय नेचरल
गैस से चलाने
पर जोर दिया
गया। इससे
पिछले एक दशक
में वायु
प्रदूषण 50
फीसदी तक घटा।
यहां
नियंत्रित बस
लेन, रेलवे
एक्सटेंशन और
पार्क एंड
राइड सुविधा
की बात भी की
जा रही है।
हालांकि
ट्रैफिक की
समस्या से यह
शहर अब भी जूझ
रहा है। यहां 57
लाख वाहन हैं,
जिनमें
रोजाना दो
हजार और जुड़
जाते हैं।
हर कार औसतन 45
दिन जाम में
फंसी रहती है।
ट्रैफिक
पुलिस भी घंटे
भर से ज्यादा
वक्त तक किसी
कार के जाम में
फंसे रहने पर
ही जाम मानती
है। यहां का
ट्रैफिक इतना
धीमा है कि
पिछले कुछ
सालों में
सैकड़ों
महिलाएं जाम
में फंसी
कारों में
बच्चों को
जन्म दे चुकी
हैं। बच्चों
को स्कूल वक्त
पर पहुंचाने
के लिए
पैरंट्स
उन्हें नींद
में ही गाड़ी
में बिठा लेते
हैं और वे ब्रश
और
ब्रेकफास्ट
तक गाड़ी में
करते देखे
जाते हैं।
लेकिन इस
स्थिति में
कुछ सबक लेने
लायक है।
मसलन रॉयल
थाई ट्रैफिक
पुलिस ने 145
अफसरों को
नर्सिन्ग की
ट्रेनिंग
दिलाई, ताकि
जरूरत पड़ने
पर बच्चे के
जन्म के वक्त
महिला को मदद
दी जा सके। अब
वे इस काम को
बखूबी अंजाम
दे रहे हैं।
इसी तरह, काम
के बोझ में दबे
शहर के चार
हजार ट्रैफिक
पुलिसवालों
के लिए मेंटल
एंड रिलेक्स
थेरपी की
वर्कशॉप कराई
गई क्योंकि
सरकार व
प्रशासन का
मानना है कि
सेहतमंद
पुलिसवाले ही
बेहतर तरीके
से काम कर सकते
हैं।
क्राइम
पर लगाम :
मेक्सिको की
राजधानी
मेक्सिको
सिटी बेहद
शांत और
सुरक्षित शहर
होता था लेकिन
1995 में इकॉनमी
क्रैश होने के
बाद यहां
क्राइम
बेतहाशा बढ़
गया। पूरी
कोशिशों के
बाद भी इनमें
से 95 फीसदी
मामले
अनसुलझे रह
जाते हैं। 2003
में यहां के
कुछ
कारोबारियों
ने न्यू यॉर्क
से मदद लेने की
ठानी। इसके
लिए उन्होंने
न्यू यॉर्क के
पूर्व मेयर,
पुलिस चीफ और
उनकी टीम को 40
लाख डॉलर दिए।
उन लोगों ने
आठ महीने की
स्टडी के बाद
मेक्सिको
सिटी को
रिपोर्ट
सौंपी। इसके
तहत सबसे पहले
छोटे अपराधों
पर फोकस किया
गया। बिना
लाइसेंस वाले
वेंडरों पर
लगाम कसी गई और
साथ ही
ट्रैफिक
तोड़नेवालों
से भी सख्ती की
गई। नतीजा,
क्राइम ग्राफ
में तेजी से
गिरावट दर्ज
की गई। अगले
कदम के तौर पर
शहर में आठ
हजार कैमरे
लगाए जा रहे
हैं।
इस
सबके दौरान
खास बात रही आम
लोगों की
भागीदारी।
मेक्सिको
युनाइटेड
अगेंस्ट
क्राइम ग्रुप
ने अपराधों के
खिलाफ 2004 में
मार्च निकाला,
जिसमें ढाई
लाख लोगों ने
शिरकत की। इस
लॉबिंग ग्रुप
की हेड मारिया
एलिना मोरेरा
पुलिस, मेयर से
लेकर
प्रेजिडंट तक
से लगातार
मुलाकात करती
हैं, ताकि
प्रेशर बनाए
रखा जा सके। वे
लोगों को
रिपोर्ट दर्ज
कराने के लिए
प्रेरित करती
हैं।
इस
ग्रुप का
मानना है कि
क्राइम से
निबटने का काम
खाली सरकार या
पुलिस के
भरोसे छोड़
देने से आम
लोगों की
जिम्मेदारी
पूरी नहीं हो
जाती।
मिलकर
करें कोशिश :
जर्काता ने
भी पलूशन और
ट्रैफिक
कंट्रोल के
लिए थ्री-इन-वन
पॉलिसी लागू
की है। नियम
बनाया गया है
कि शहर की सभी
बड़ी सड़कों
पर शाम 4:30 से 7:30 के
बीच जो भी
कारें गुजरें,
उनमें कम से कम
3 लोग हों।
सड़कों पर
गाड़ियां कम
होंगी तो
प्रदूषण
खुद-ब-खुद कम
हो जाता है।
वैसे, देश
मिलकर भी इस
दिशा में काम
कर सकते हैं।
मसलन
बांग्लादेश
और पाकिस्तान
की प्राइवेट
कंपनियों ने
जॉइंट वेंचर
पर काम शुरू
किया है, ताकि
एक वेस्ट
मैनेजमेंट
प्लांट बनाया
जा सके। इसमें
रोजाना 3200
मीट्रिक टन
वेस्ट को
ऑर्गेनिक
फर्टिलाइजर
में तब्दील
किया जा सके।