देह की भाषा-पते की बात-विचार मंच-Navbharat Times
 
देह की भाषा
10 Nov 2008, 2359 hrs IST,नवभारत टाइम्स  
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हमारे भाव हमारे व्यवहार में दिखते हैं। एक प्रसन्न व्यक्ति की मुद्राएं उदास इंसान से अलग होती हैं। हमारा स्वभाव हमारी चेष्टाओं से झांकता है। हम किसी को देखकर ही अनुमान लगा लेते हैं कि अमुक व्यक्ति बड़ा सीधा है या दंभी है। नब्बे फीसदी मामलों में हमारा अनुमान सही ही होता है, क्योंकि देह झूठ नहीं बोलती। व्यक्ति की भौगोलिक ही नहीं सामाजिक पृष्ठभूमि भी उसकी देह भाषा से झलकती है। लेकिन इंसान शुरू से ही इस भाषा को जीतने की कोशिश करता रहा है।

इसी क्रम में शिष्टाचारों का चलन शुरू हुआ होगा। यानी आप चाहे लाख दुख-तकलीफ में हों, आपको सार्वजनिक स्तर पर खुश दिखना है। यह देह की भाषा के विरुद्ध जाना हुआ। यह देह की लगाम को खींचकर एक खास सांचे में स्थिर करना हुआ। ज्यों-ज्यों सभ्यता आगे बढ़ी, इस भाषा पर अधिकार करने के नए-नए तरीके ढूंढे गए। कभी कपड़े के जरिए तो कभी सामाजिक तौर-तरीकों के जरिए। शिक्षा भी कुछ यही काम करती है।

लेकिन इन सारी कवायदों के बावजूद देह की भाषा समाप्त नहीं हुई। इंसान कुछ भी कर ले, वह अपने को देर तक छिपा नहीं पाता। देह की भाषा लाखों परतों को भेदकर बाहर आ ही जाती है। इंसान की यह पराजय साबित करती है कि अब भी मनुष्य और मशीन में फर्क बचा हुआ है।

संजय कुंदन
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