सुजाता
दुआ,
दिल्ली
तुमने
चाहा था
खोल
दूं दिल की वह
गांठ
होंठ तो
खुले, पर
शब्द
निकले ही
नहीं।
आंखों
ने तो कही थी
मन की वह बात,
पर
तुम समझे
ही नहीं।
मैंने चाहा
तो था तुम
पढ़ो दिल की
वह किताब
उन
पृष्ठों पर थे
जो शब्द
तुम्हें
दिखे ही नहीं।
कहा था
तुमने
यह है
जनम भर का साथ
पर कहां था
तुम्हारा हाथ
मुझे दिखा ही
नहीं।
मेरा
हर सवाल
लौट
आता खाली हाथ
फिर भी हो
भ्रमित
चल
रही हूं साथ।
क्यों है अब
भी आस,
मैं
समझी ही नहीं!