सूर्यकुमार
पांडेय
आदरणीय
स्वयंभू
अध्यक्ष
जी,
इस तरह मेरा
टिकट काटने से
बेहतर था कि आप
ने मेरी नाक ही
काट ली होती।
मैं भी आप ही
की तरह नकटा हो
गया होता। न आप
चुनाव लड़ रहे
हैं, न आपने
मुझे ही लड़ने
दिया। खैर,
आपकी तो जमानत
भी नहीं बचती।
मैं इतनी तो
बचा ही सकता
था। मैं जनता
की सेवा करना
चाहता था।
आपने सेवा भाव
का अपमान करके
बहुत बुरा
किया है। यह
देश आपको कभी
माफ नहीं
करेगा। हे
काटू-छांटू
राजनीति के
प्रपितामह,
आपने मेरा
टिकट काटा।
जाइए, मैं भी
आपको
आशीर्वाद
देता हूं। अब
मेरे
बाल-बच्चों की
शुभकामनाओं
से आपका आने
वाला वक्त चैन
से नहीं
कटेगा। मुझको
भी कमतर मत
जानिएगा। ऐसा
काटूंगा कि आप
लहरा तक नहीं
सकेंगे। मेरे
समर्थकों ने
कल एक ट्रेलर
तो दिखला ही
दिया, जब
उन्होंने
आपकी गाड़ी का
पहिया पंचर
किया था। अब
बाकी की हवा
मैं
निकालूंगा।
आपने
मेरी जगह पर
अपने
खासुलखास
चमचे को टिकट
पकड़ा दिया।
जनाब, उसको
चमचा कहना, इस
सात्विक शब्द
का अपमान है।
राजनीति में
चमचत्व की
अवधारणा पर
कुल्हाड़ाघात
है। वह तो
पिट्ठू है।
परले दर्जे का
पिछलग्गू।
उसके पास एक
लगातार हिलने
वाली दुम के
सिवा कुछ भी तो
खास नहीं।
अगले ने आपके
आगे क्या हिला
दी, आपने एक
झटके में चमचे
को भगौने के
स्टैंडर्ड के
समकक्ष लाके
खड़ा कर डाला।
मान्यवर,
आपने एक
लग्गू-भग्गूनुमा
रीढ़विहीन
प्राणी की
शैतानी
खोपड़ी पर
अपना वज्र
हस्त धरा है।
इसकी वजह से
लोकतंत्र का
सिर शर्म से
झुक गया है।
इसी के चलते
मेरा भी झुका
हुआ है। इसको
आप विनम्रता
की वजह से झुका
हुआ समझने की
त्रुटि कतई मत
कीजिएगा। और
कर भी लेंगे तो
आपकी ही
खोपड़ी को
खतरा रहेगा,
जिसे निकट
भविष्य में
किसी रोज
फूटना ही है।
महोदय, मैं
दूसरे भी किसी
दल के टिकट
हथिया सकता
था। इसकी मुझे
आदत भी है।
लेकिन इस बार
मसला जरा
टेढ़ा फंस
गया। मैं आप
जैसे घाघ के
झांसे में आ
गया। खैर, मैं
निरंतर अपने
सरीखे
अटिकटार्थियों
से संपर्क
बनाए हुए हूं।
जिस रोज मौका
हाथ लग गया,
सबसे पहले
आपकी चुनाव
समिति की जांच
के लिए एक
कमेटी
बिठाऊंगा।
मैं अभी तक यह
नहीं समझ पा
रहा हूं कि
आखिरकार आपने
मेरा टिकट
काहे को काटा?
क्या चुनाव
लड़ने की मेरी
दावेदारी
मूली जैसी नरम
थी, और उस चमचे
की पत्थर जैसी
कठोर, जो आपसे
काटे न
कटी।
श्रीमान
जी, इस बार
पार्टी ने एक
पत्थर को पूजा
है। अब मुझको
भी जवाब में
ईंट से ईंट
बजानी ही
होगी। न तो मैं
किसी से पतला
हूं, और न ही
मेरी छवि ही
खराब है। और
छवि खराब होती
भी कैसे? छवि
तो उसकी खराब
होती है, जिसकी
होती हो। हे
अति
अविश्वसनीयता
के प्रतीक
पुरुष, आपकी
घुन्ना
खोपड़ी को
स्मरण तो होगा
कि मैं पिछली
दफा आपके
आश्वासन पर इस
दल में शामिल
हुआ था। घर आए
मेहमान के साथ
ऐसी बदसलूकी
भारतीय
परंपरा के
विरुद्ध है।
होना तो यह
चाहिए था कि घर
वाले बाद में
खाते, पहले
मेहमानों के
आगे छकने के
लिए पत्तलें
परोस दी गई
होतीं। लेकिन
यहां पर मुझ
जैसे मेहमान
को ही छका दिया
गया। जिस दल को
भारतीय
परंपराओं से,
धर्म से, उसकी
संस्कृति से
प्यार न हो,
मैं उसको किसी
भी वक्त
ठुकराने और
लात मारने को
तैयार बैठा
हूं। सिर्फ
सही मौके की
तलाश में हूं।
वह कभी भी आ
सकता है। ढेर
सारी
पार्टियों के
नेता मेरे
संपर्क में
हैं। बातचीत
चल रही है.
अपनी डील किसी
भी टाइम फाइनल
हुई
समझिए।
हे
निर्मम, मैंने
पिछले दो
दिनों में
आपको जितनी
बार फोनियाया
होगा, उसकी कॉल
डिटेल्स मैं
उचित समय पर
सार्वजनिक
करूंगा। अभी
तो इतना ही
कहूंगा कि
आपके सारे
कनेक्शन आपको
ही मुबारक
हों। भगवान हर
किसी को कभी न
कभी एक मौका
जरूर देता है।
मुझे भी देगा।
तब मैं आपको
काटे बिना
नहीं छोड़ने
वाला हूं। सो
इस वादे के साथ
पत्र लिखवाना
समाप्त करता
हूं कि अपने
सगे बाप की
कसम, फ्यूचर
में आपसे फिर
कभी नहीं
मिलूंगा, अगर
राजनीतिक
समीकरणों ने
मुझको मजबूर न
किया।