स्वामी
नित्यानंद
चर्चित
टीवी सीरियल
'क्योंकि सास
भी कभी बहू थी'
टीवी से विदा
हो गया है पर
उसने कई कल्चर
फैलाए, जिनका
दूसरे
धारावाहिकों
पर गजब का असर
पड़ा है।
इसमें से एक
है-मंथरा
कल्चर। आज
धारावाहिकों
में मंथरा
कल्चर सिर
चढ़कर बोल रहा
है। मिथकों से
निकल कर मंथरा
एक वाद के रूप
में पर्दे पर
पसर गई है।
मंथरा अब एक
व्यक्ति न
होकर
प्रवृत्ति बन
गई है। किसी भी
सीरियल को अंत
तक देख जाइए
उसमें और कुछ
हो न हो, मंथरा
अवश्य होगी।
कई बार सीरियल
देखकर भ्रम
होता है कि
घर-घर में
मंथरावाद पसर
गया है।
पहली नज़र
में सभी
सीरियलों में
एक बात समान
रूप से पाई
जाती है। सब एक
दूसरे के पीछे
लगे रहते हैं।
सास बहू के
पीछे, बहू देवर
के पीछे, देवर
ननद के पीछे,
ननद जेठ के
पीछे, जेठ ससुर
के पीछे, ससुर
सास के पीछे।
मजा ये कि लगे
हैं पीछे और
दिखा रहे हैं
कि सब एक दूसरे
से आगे हैं।
हर सीरियल
में किसी न
किसी रूप में
मंथरा की
अनिवार्य
उपस्थिति है।
चालाक
गृहणियां
मंथरा को सदैव
प्रसन्न रखने
की जुगत में
रहती हैं।
मंथरा के
स्वागत
सत्कार में
थोड़ी भी कमी
हुई तो वह
दूसरों के घर
जाकर प्रवचन
शुरू कर देती
है। प्रवचन
कुछ इस तरह के
होते हैं- फलां
के घर की बहू
छोटे घर की है,
तीज त्योहार
पर भी कुछ देती
नहीं।
अकस्मात किसी
बात पर मंथरा
रूठ गई तो घर
का काम साफ
सफाई और रसोई
खुद करनी
पड़ती है।
सीरियली
मंथराएं
जासूसी में तो
मानो
एक्सपर्ट
होती हैं, जरा
सी
खुसुर-फुसुर
पर मंथरा के
कान सजग हो
जाते हैं। कई
सीरियलों में
तो मंथरा
मात्र जासूसी
के लिए ही रखी
जाती है। उसका
काम होता है घर
के सदस्यों की
बातें अनजान
बने रहकर
सुनना। लोगों
के चेहरे भांप
कर वह सही
स्थिति का
अंदाजा लगा
लेती हैं।
ये आधुनिक
मंथराएं अपने
स्वार्थ
संचालन में
इतनी कुशल
होती हैं कि हर
घर में इनकी
मांग बराबर
बनी रहती है।
उनका स्वार्थ
न सधे तो किसी
भी खानदान की
ऐसी-तैसी करने
में जरा देर
नहीं लगातीं।
इस मंथरा का
मुख्य हथियार
चुगली होती
है। इसी
हथियार से वह
खानदान के
सदस्यों को
परस्पर भिड़ा
देती हैं। सास
को बहू के
विरुद्घ
भड़काना हो तो
कहेंगी- मां
जी, देखिए कैसा
जमाना आ गया
है।
आप की
चाय में बूंद
भर दूध और बहू
की चाय में
सिर्फ दूध ही
दूध। आपकी
रोटी में बस
बूंद भर घी और
बहू घी से तर
रोटी खाती है।
बहू को सास से
भिड़ाना हो तो
कहेगी-
बहूरानी मुझे
आप पर दया आती
है इतना काम
करते देख कर और
एक आप की
सासूजी हैं।
दिन भर टीवी से
चिपक पलंग
ढीला करती
रहती हैं। इस
तरह हर घर में
आग लगाना
मंथरा का
पॉप्युलर
कल्चर है। मजा
ये कि इतने पर
भी मंथरा सब की
प्रिय पात्र
बनी रहती है।
पर वह किसी
की सगी नहीं
रहती। मंथरा
को सब अलग-अलग
अपने कमरे में
बुलाते हैं
खिलाते हैं
पिलाते हैं और
कूटनीतिक
भाषा में
बातें करते
हैं जैसे- हां
भई, अब तो घोर
कलयुग है।
हमने भी बच्चे
पाले हैं पर
ऐसा तो नहीं
देखा। रामायण
की मंथरा से
सीरियलों की
मंथरा कई कोस
आगे है। वो
मंथरा
चरित्रहीन थी
पर मॉडर्न
मंथरा
चरित्रवान है
क्योंकि किसी
के भी चरित्र
की चपड़कनाती
करने में देर
नहीं लगाती।
खानदान के
सदस्य एक
दूसरे को भले
मात दे दें पर
मंथरा को मात
देना आसान
नहीं। कोई भी
ये जानने में
समर्थ नहीं कि
मंथरा के मन
में कब क्या चल
रहा है।
ये
मॉडर्न मंथरा
किस को किस का
वादा कब कहां
याद दिला दे,
किसका घर से
निष्कासन करा
दे, ये जानना
बहुत कठिन है।
कितने हर्ष का
विषय है कि उस
मंथरा की तो
बाद में भरत ने
मरम्मत भी कर
दी थी, पर इस
मंथरा को कोई
कुछ नहीं कहता,
उल्टे सब उसके
गुण गाते रहते
हैं क्योंकि
हरेक के दिल
में मंथरा के
गुणों को धारण
करने की इच्छा
रहती है।