दार्शनिकों
ने कहा
है कि
दुख है, तभी तो
सुख की
अनुभूति है।
असत्य के होने
से सत्य की
ज्यादा
सार्थकता है।
शुत्रुओं से
घिरे होने पर
मित्र की
पहचान होती
है। अंधकार है,
तो प्रकाश का
अहसास ज्यादा
अर्थवान लगता
है। परस्पर
विरोधी चीजें
ही अक्सर एक
दूसरे के
अस्तित्व और
सार्थकता को
बनाए हुए
दिखती हैं।
जरा
विचारें कि
अगर सर्वत्र
सुख ही सुख
होता, प्रकाश
ही प्रकाश और
मित्र ही
मित्र होते, तो
निश्चय ही उस
एकरसता से हम
घबरा उठते।
अपनी अमीरी से
अघाए हुए
मुल्कों में
लोग परेशान
होकर पिछड़े
मुल्कों में
देखने जाते
हैं कि आखिर
गरीबी क्या
होती है। क्या
पता कि वे शायद
गरीब होकर
जीना भी चाहते
हों।
श्रमरहित
जीवन जी रहे
समाज को
हिदायत दी
जाती है कि कुछ
नहीं, तो
एक्सरसाइज के
बहाने ही
थोड़ा पसीना
बहाया जाए।
असल में,
मेहनत है, तभी
तो आराम का
आनंद है। आशय
यह नहीं है कि
हम गरीबी,
अशिक्षा,
भुखमरी का
समर्थन करें
या उन्हें
बनाए रखने की
मांग करें, पर
हमें इनका
अहसास इसलिए
होना चाहिए कि
इन विपरीत
कहलाने वाली
बातों से ही
हमें
सकारात्मक
चीजों की
अर्थवत्ता का
गहराई से
अहसास हो सकता
है।
संजय
वर्मा